शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का पावन पर्व चैत्र नवरात्रि पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व मां दुर्गा की उपासना, आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। चैत्र नवरात्रि से ही हिंदू नववर्ष का शुभारंभ भी होता है, जिससे इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, घरों में कलश स्थापना करते हैं और मंदिरों में भजन-कीर्तन के माध्यम से वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व केवल पूजा का ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और मन की शुद्धि का भी अवसर है। इन दिनों में लोग सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करते हैं।
नवरात्रि के अंतिम दिनों में अष्टमी और नवमी का विशेष महत्व होता है। इन दिनों कन्या पूजन (कंजक पूजन) किया जाता है, जिसमें छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। यह परंपरा नारी शक्ति के सम्मान और उसके प्रति श्रद्धा को दर्शाती है।
वर्ष 2026 में अष्टमी 26 मार्च को और नवमी 27 मार्च को मनाई जाएगी। ऐसे में श्रद्धालु अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार दोनों में से किसी भी दिन कन्या पूजन कर सकते हैं। प्रातःकाल से दोपहर तक का समय कन्या पूजन के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।
कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के चरण धोकर उन्हें तिलक लगाया जाता है, कलावा बांधा जाता है और हलवा-पूरी व चने का प्रसाद खिलाया जाता है। अंत में उन्हें दक्षिणा व उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। मान्यता है कि कन्याओं के आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।
आधुनिक समय में भी नवरात्रि की प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि नारी सम्मान, सकारात्मक सोच और सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश भी देता है। इस प्रकार चैत्र नवरात्रि आस्था, अनुशासन और शक्ति का महापर्व है, जिसका समापन कन्या पूजन के साथ पूर्ण माना जाता है।








