लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सामने आए बहुचर्चित जीएसटी घोटाले ने अब बड़ा रूप ले लिया है। मुख्य आरोपी भगवान सिंह उर्फ भूरा प्रधान की गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों ने तेजी से कार्रवाई शुरू कर दी है। विशेष जांच दल (एसआईटी) को मिले डिजिटल साक्ष्यों से यह खुलासा हुआ है कि इस पूरे नेटवर्क के संचालन में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका रही है, जिन पर अब शिकंजा कसता जा रहा है।
जांच के दौरान सामने आया है कि आरोपी ने लंबे समय तक कानून की पकड़ से बचने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लिया। वह विदेशी वर्चुअल नंबरों का उपयोग करता था, जिससे उसकी वास्तविक लोकेशन का पता लगाना कठिन हो जाता था। इसके साथ ही एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए अधिकारियों से संपर्क बनाए रखा जाता था और पूरे नेटवर्क का संचालन किया जाता था।
सूत्रों के अनुसार, एसआईटी को आरोपी के कब्जे से मिले मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों से कई अहम जानकारियां प्राप्त हुई हैं। इनमें व्हाट्सएप चैट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और लेनदेन से जुड़े डिजिटल साक्ष्य शामिल हैं। इन साक्ष्यों के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि करीब 250 करोड़ रुपये कथित रूप से सुविधा शुल्क के रूप में विभिन्न अधिकारियों में बांटे गए।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी के संपर्क में प्रदेशभर के 20 से अधिक वरिष्ठ जीएसटी अधिकारी रहे हैं। इन अधिकारियों के साथ हुई बातचीत और लेनदेन के रिकॉर्ड अब जांच एजेंसियों के पास हैं, जिनके आधार पर उनकी भूमिका की गहन जांच की जा रही है। विभागीय स्तर पर इस खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है।
छापेमारी के दौरान बड़ी संख्या में फर्जी कंपनियों से जुड़े दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं। बताया जा रहा है कि करीब 535 फर्जी फर्मों के जरिए इस घोटाले को अंजाम दिया गया, जिनका कुल टर्नओवर 5473 करोड़ रुपये से अधिक दर्शाया गया। जांच में लगभग 989 करोड़ रुपये की जीएसटी चोरी और अवैध इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) क्लेम के प्रमाण भी मिले हैं।
यह मामला केवल एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं है। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि यह नेटवर्क अंतरराज्यीय स्तर पर फैला हुआ था और कई राज्यों में सक्रिय था। विभिन्न जिलों में इसके संचालन की पुष्टि हुई है, जहां स्थानीय स्तर पर अधिकारियों के साथ कथित सांठगांठ की बात सामने आई है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नेटवर्क के जरिए ट्रांसपोर्ट और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े मामलों में भी अवैध वसूली की जाती थी। ट्रकों को छुड़वाने के लिए प्रति ट्रक 20 से 30 हजार रुपये तक की दर तय होने की बात सामने आई है। पिछले कई वर्षों से यह अवैध गतिविधियां संचालित हो रही थीं, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा।
एसआईटी अब उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की सूची तैयार कर रही है, जिनके नाम डिजिटल साक्ष्यों में सामने आए हैं। व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्ड के मिलान के बाद संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़े नाम उजागर हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संगठित घोटाले देश की कर प्रणाली को कमजोर करते हैं और ईमानदार करदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई और पारदर्शी जांच बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
फिलहाल जांच एजेंसियां पूरे मामले की तह तक जाने में जुटी हैं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि इस घोटाले से जुड़े किसी भी दोषी को बख्शा न जाए। उत्तर प्रदेश का यह जीएसटी घोटाला आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासों की ओर संकेत कर रहा है, जिससे प्रशासनिक तंत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता भी उजागर हो रही है।








