शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। अस्पतालों में दवाओं के रखरखाव और वितरण में फार्मासिस्ट की अनिवार्यता समाप्त करने के प्रस्ताव को लेकर देशभर में विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं। इसी क्रम में सहारनपुर में भी फार्मासिस्ट संगठनों ने इस प्रस्ताव पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे स्वास्थ्य व्यवस्था और युवाओं के भविष्य के लिए खतरनाक बताया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के सलाहकार बोर्ड द्वारा दिए गए प्रस्ताव में कहा गया है कि अस्पतालों में फार्मासिस्ट के स्थान पर साइंस ग्रेजुएट को भी दवा वितरण और प्रबंधन का कार्य सौंपा जा सकता है। इस प्रस्ताव के सामने आते ही फार्मेसी से जुड़े संगठनों और छात्रों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।
इंडियन फार्मासिस्ट वॉयस के अध्यक्ष डॉ. अमर हक ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह निर्णय लाखों फार्मेसी छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि फार्मेसी एक विशेष तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का क्षेत्र है, जिसमें प्रशिक्षित विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। ऐसे में किसी सामान्य साइंस ग्रेजुएट को इस जिम्मेदारी देना न केवल पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचाएगा, बल्कि मरीजों की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञता को महत्व दिया जाता है, तो फिर फार्मेसी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इस प्रकार की ढील क्यों दी जा रही है। उनका कहना था कि हर वर्ष हजारों छात्र मेहनत और खर्च करके फार्मेसी की पढ़ाई करते हैं, ताकि उन्हें इस क्षेत्र में रोजगार मिल सके, लेकिन इस प्रस्ताव से उनके करियर पर सीधा असर पड़ेगा।
फार्मासिस्ट संगठनों का कहना है कि यदि इस प्रस्ताव को लागू किया गया तो इससे दवा वितरण प्रणाली की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। दवाओं की सही मात्रा, उनके उपयोग और संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी केवल प्रशिक्षित फार्मासिस्ट ही बेहतर तरीके से दे सकते हैं। ऐसे में गैर-विशेषज्ञों को यह जिम्मेदारी देना मरीजों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है।
संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि इस प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और फार्मासिस्ट की अनिवार्यता को बरकरार रखा जाए। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।
स्थानीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यह केवल रोजगार का मुद्दा नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने सरकार से अपील की कि किसी भी निर्णय से पहले संबंधित विशेषज्ञों और संगठनों की राय अवश्य ली जाए।
फार्मासिस्ट संगठनों का मानना है कि यह प्रस्ताव स्वास्थ्य व्यवस्था में अनावश्यक जोखिम पैदा कर सकता है और इससे आम जनता का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे में इस मुद्दे पर गंभीरता से पुनर्विचार करना आवश्यक है।








