मनोज मिड्ढा
सहारनपुर। उत्तर प्रदेश में हुक्का बार और सार्वजनिक स्थानों पर हुक्का परोसे जाने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्पष्ट फैसले के बाद अब सहारनपुर में पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। शहर और आसपास के क्षेत्रों में हुक्का बार संचालित होने की चर्चाओं के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन प्रतिष्ठानों की वास्तविक स्थिति की जांच कराएगा और हाईकोर्ट के आदेश का धरातल पर पालन सुनिश्चित करेगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 29 सितंबर को दिए फैसले में स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में रेस्तरां, कैफे और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनाए गए निर्धारित स्मोकिंग एरिया में भी ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। अदालत ने हुक्का तैयार करने, उसमें तंबाकू भरने, कोयला लगाने और ग्राहक तक पहुंचाने जैसी गतिविधियों को सेवा के दायरे में माना। अदालत ने कहा कि हुक्का बार का संचालन और रेस्तरां में हुक्का सेवा संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है। फैसले की प्रति मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को अनुपालन के लिए भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अब सहारनपुर में सवाल यह है कि हाईकोर्ट का आदेश मिलने के बाद पुलिस ने क्या कार्रवाई की? क्या जिले के सभी थाना प्रभारियों और चौकी प्रभारियों को हुक्का बारों के संबंध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए? क्या शहर और देहात क्षेत्र में संचालित बताए जा रहे हुक्का बार, कैफे और रेस्टोरेंट की सूची तैयार कर उनकी जांच शुरू की गई?
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल रेस्टोरेंट का लाइसेंस या अलग स्मोकिंग एरिया होने से हुक्का परोसने की अनुमति नहीं मिल जाती। अदालत ने पुलिस को COTPA के तहत अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए जांच, तलाशी, जब्ती और संबंधित कार्रवाई की शक्ति भी स्पष्ट की है।
ऐसे में सहारनपुर में एक और अहम सवाल सामने है—क्या हाईकोर्ट के फैसले के बाद यहां संचालित बताए जा रहे हुक्का बारों ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए हैं? क्या संचालकों ने स्वयं हुक्का सेवा रोक दी है या अब भी कहीं ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध कराया जा रहा है? यदि कोई प्रतिष्ठान अभी भी ऐसी गतिविधि कर रहा है तो क्या पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच की है?
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं में बढ़ता हुक्का चलन भी है। कभी गांव की चौपालों और पंचायतों में सामाजिक बैठकों का हिस्सा रहा हुक्का अब कई जगह आधुनिक कैफे और बार संस्कृति का हिस्सा बनता दिखाई देता है। फ्लेवर, आकर्षक माहौल और मनोरंजन के नाम पर हुक्के का इस्तेमाल युवाओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में सवाल यह भी है कि युवाओं के बीच हुक्का आखिर फैशन और मनोरंजन का माध्यम क्यों बनता जा रहा है? क्या उन्हें इसके स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की पर्याप्त जानकारी है? क्या अभिभावक और शैक्षणिक संस्थान इस बदलती प्रवृत्ति पर ध्यान दे रहे हैं?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि शहर में किसी पुलिस थाने या चौकी के आसपास ही हुक्का बार संचालित होने की शिकायतें हैं तो संबंधित पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की नजर उन पर क्यों नहीं पड़ती? क्या ऐसे प्रतिष्ठानों की नियमित जांच होती है? क्या स्कूल-कॉलेजों और भीड़भाड़ वाले इलाकों के आसपास विशेष निगरानी की जाती है?
अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद सहारनपुर पुलिस और प्रशासन के सामने इन सवालों का जवाब कार्रवाई के माध्यम से देने की चुनौती है। नागरिकों की नजर इस बात पर है कि क्या जिले में हुक्का बारों को लेकर कोई व्यापक जांच या अभियान शुरू होता है, क्या संचालकों को स्पष्ट निर्देश दिए जाते हैं और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर क्या नियमानुसार कार्रवाई की जाती है।
हाईकोर्ट का आदेश अब सार्वजनिक दस्तावेज है और उसका अनुपालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सहारनपुर में आदेश का असर केवल कागजों और निर्देशों तक रहता है या पुलिस-प्रशासन वास्तव में धरातल पर हुक्का बारों की जांच और कार्रवाई करता है।








