शहरी चौपाल ब्यूरो
नानौता/सहारनपुर। आजाद समाज पार्टी के नेता चेयरमैन अफजाल खान ने हाल ही में संपन्न हुए एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली जीत को भाजपा विरोधी मतों के एकजुट होने का परिणाम बताया है। उन्होंने कहा कि चुनाव में सपा को मिले वोट केवल उसके अपने समर्थकों के नहीं थे, बल्कि बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, एआईएमआईएम और अन्य सेक्युलर दलों के समर्थकों ने भी भाजपा के विरोध में सपा प्रत्याशियों को मतदान किया।
चेयरमैन अफजाल खान ने कहा कि एमएलसी चुनाव के परिणामों को केवल समाजवादी पार्टी के जनाधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, इन चुनावों में भाजपा के विरोध में मतदान करने वाले विभिन्न दलों के समर्थकों के वोट एक जगह एकत्र हो गए थे। इन दलों का कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं होने के कारण भाजपा विरोधी मतों का लाभ सपा को मिला और उसके प्रत्याशियों ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की।
आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर उन्होंने दावा किया कि जब सभी राजनीतिक दल अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेंगे तो चुनावी समीकरण बदल जाएंगे। आजाद समाज पार्टी भी प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी भूमिका तय करेगी और पार्टी बड़ी जीत दर्ज करेगी। उन्होंने कहा कि आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी की राजनीतिक ताकत को नजरअंदाज करके प्रदेश में सरकार बनाने की कल्पना नहीं की जा सकती।
समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर अफजाल खान ने कहा कि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव होने से भाजपा को सीधा फायदा मिल सकता है। एमएलसी चुनाव के नतीजों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब भाजपा विरोधी वोट एक जगह एकत्र हुए, तभी सपा प्रत्याशियों को जीत मिली। विधानसभा चुनाव में यदि विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो इन वोटों के बंटने की संभावना रहेगी।
उन्होंने कहा कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए विपक्षी दलों के बीच चुनावी रणनीति और तालमेल पर विचार करना जरूरी है। अफजाल खान ने दोहराया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में आजाद समाज पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी और पार्टी के सहयोग के बिना प्रदेश में किसी भी दल के लिए सरकार बनाना आसान नहीं होगा।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां और संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। उनके बयान से विपक्षी दलों के बीच भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे और चुनावी तालमेल का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।








