खाड़ी देशों में युद्ध का असर भारत के बाजारों पर, तेल और उर्वरक महंगे होने की आशंका

आयात-निर्यात प्रभावित, कृषि लागत बढ़ने और कई उद्योगों पर संकट के संकेत

 

शहरी चौपाल ब्यूरो 

लखनऊ। पश्चिम एशिया के खाड़ी देशों में जारी युद्ध और तनाव का असर अब भारत के बाजारों में भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और गैस आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच व्यापारियों और विशेषज्ञों ने आने वाले समय में तेल, गैस और उर्वरकों की कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि की आशंका जताई है। इसका सीधा प्रभाव कृषि, उद्योग और निर्यात कारोबार पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के कारण खाड़ी देशों के साथ आयात-निर्यात गतिविधियां प्रभावित होने लगी हैं। इस क्षेत्र से कच्चा तेल, गैस और कई रासायनिक पदार्थ बड़ी मात्रा में भारत आते हैं। युद्ध जैसी स्थिति के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजार में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो उर्वरकों की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। बख्शी तालाब स्थित चंद्रभानु कृषि महाविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ डॉ. सत्येंद्र कुमार सिंह के अनुसार सऊदी , अरब कतर ओमान , यूनाइटेड अरब अमीरात , यूरिया, सल्फर और अमोनिया जैसे उर्वरकों के प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश हैं। ईरान से आने वाला अमोनिया फसलों के लिए जरूरी पोषक तत्व तैयार करने में इस्तेमाल होता है। यदि इन देशों से आपूर्ति प्रभावित होती है तो उर्वरकों की उपलब्धता घट सकती है, जिससे किसानों की लागत बढ़ने और सरकार की सब्सिडी पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना है।

खाद कारोबार से जुड़े व्यापारी अनुपम अग्रवाल का कहना है कि बाजार में अभी से स्टॉक की कमी दिखाई देने लगी है। इस समय आलू की खुदाई और सरसों की कटाई का दौर चल रहा है, जबकि नई फसलों की बुआई में अभी समय है। इसके बावजूद उर्वरकों और कृषि सामग्री के स्टॉक में कमी का असर दिखाई देने लगा है। उनका कहना है कि यदि सरकार को विदेशों से अधिक कीमत पर खरीद करनी पड़ी तो इसका असर सीधे बाजार में महंगाई के रूप में दिखाई देगा और किसानों की लागत भी बढ़ेगी।

खाड़ी देशों में जारी तनाव का असर लखनऊ के पारंपरिक उद्योगों पर भी पड़ रहा है। ईद के मद्देनजर खाड़ी देशों से मिलने वाले ऑर्डरों में गिरावट के कारण चिकनकारी उद्योग को बड़ा झटका लगा है। लखनऊ चिकनकारी हैंडीक्राफ्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष संजीव अग्रवाल के अनुसार करीब 15 करोड़ रुपये के ऑर्डर फिलहाल होल्ड पर चले गए हैं, जबकि कई संभावित ऑर्डर रद्द हो गए हैं। इससे लगभग 50 करोड़ रुपये के निर्यात कारोबार पर असर पड़ा है। उन्होंने बताया कि चिकनकारी उत्पादों का करीब 25 प्रतिशत निर्यात खाड़ी देशों में होता है, जबकि शेष 75 प्रतिशत यूरोप और अमेरिका के बाजारों में जाता है।

चावल निर्यात कारोबार पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। पांडेयगंज के गल्ला व्यापारी राजेंद्र अग्रवाल के अनुसार सेला चावल का बड़ा हिस्सा ईरान को निर्यात किया जाता है, लेकिन मौजूदा हालात के कारण निर्यात लगभग रुक गया है। इसका असर कीमतों पर भी पड़ा है। पहले लगभग 7000 रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाला सेला चावल अब करीब 6000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है।

इस स्थिति को देखते हुए ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से बंदरगाहों पर फंसे माल पर लगने वाली पेनाल्टी में राहत देने और निर्यातकों के अटके हुए भुगतान को बैंकों के माध्यम से जारी कराने की मांग की है।

वहीं परिवहन क्षेत्र पर भी संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद फिलहाल भारतीय पेट्रोलियम कंपनियों ने कीमतें स्थिर रखने की बात कही है, लेकिन व्यापारियों का मानना है कि यदि वैश्विक कीमतों में तेजी जारी रही तो इसका असर परिवहन भाड़े पर भी पड़ सकता है।

ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े राज नारायण का कहना है कि सामान्यतः पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ने पर परिवहन लागत भी बढ़ जाती है, जिससे सभी वस्तुओं के दाम प्रभावित होते हैं। हालांकि फिलहाल कंपनियों के साथ हुए अनुबंध के कारण 31 मार्च तक परिवहन भाड़ा नहीं बढ़ाया जाएगा, ताकि व्यापार और बाजार पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, उद्योग, निर्यात और घरेलू बाजारों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार और व्यापारिक जगत दोनों स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

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