शहरी चौपाल ब्यूरो
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा चुनावी राजनीति को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बसपा संस्थापक और दलित आंदोलन के प्रखर नेता कांशीराम की जयंती के अवसर पर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। लखनऊ में आयोजित सामाजिक परिवर्तन दिवस कार्यक्रम में शामिल होकर राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित होने का समर्थन किया और दलित समाज को साधने का प्रयास किया।
कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान राहुल गांधी ने कहा कि यदि पंडित जवाहरलाल नेहरू आज जीवित होते तो कांशीराम कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि कांग्रेस ने दलित समाज के लिए समय पर बेहतर काम किया होता तो कांशीराम को अलग से इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। राहुल गांधी के इस बयान को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

दलित वोट बैंक पर सपा-कांग्रेस की नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का यह कदम दलित मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने विपक्षी गठबंधन का समर्थन किया था, जिसके चलते उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 सीटों पर विपक्ष को सफलता मिली थी। इसी आधार पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी एक बार फिर दलित वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं।
हालांकि कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है, लेकिन राहुल गांधी उससे दो दिन पहले ही कार्यक्रम में शामिल हो गए। वहीं समाजवादी पार्टी भी 15 मार्च को कांशीराम जयंती पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इससे स्पष्ट है कि दोनों दल भले ही अलग-अलग मंचों पर कार्यक्रम करें, लेकिन उनकी नजर एक ही वोट बैंक पर है।
कांशीराम की राजनीति का रहा अलग अंदाज
दलित राजनीति के प्रमुख चेहरे रहे कांशीराम का मानना था कि पिछड़े और दलित समाज को सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए सत्ता में भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। इसी सोच के तहत उन्होंने समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन किए।
वर्ष 1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांशीराम ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। उस समय बसपा ने 296 और कांग्रेस ने 126 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें बसपा को 67 और कांग्रेस को 33 सीटों पर जीत मिली थी।
बीजेपी और सपा से भी किया गठबंधन
कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद कांशीराम ने भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से वर्ष 1997 में मायावती को मुख्यमंत्री बनाया था, हालांकि यह गठबंधन भी कुछ ही महीनों में समाप्त हो गया। इससे पहले 1993 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जो 1995 में टूट गया था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांशीराम की विरासत आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद प्रभावशाली है। यही कारण है कि आगामी चुनावों को देखते हुए विभिन्न दल उनके नाम और विचारों के जरिए दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।








