नई दिल्ली । केंद्रीय चुनाव आयोग ने रविवार को देश के पांच राज्यों — असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु तथा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा कर दी है। इन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश की कुल 824 विधानसभा सीटों के लिए 9 अप्रैल से 29 अप्रैल तक मतदान कराया जाएगा, जबकि मतगणना 4 मई को होगी। चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और सभी राजनीतिक दल चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं।
इन विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में सत्ताधारी दलों के सामने अपनी सरकार बचाने की चुनौती है, तो वहीं विपक्षी दल सत्ता हासिल करने की पूरी कोशिश में हैं। असम और पुडुचेरी में भारतीय जनता पार्टी को अपनी सरकार बरकरार रखने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए सत्ता कायम रखना महत्वपूर्ण होगा। इसी तरह तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती है, जबकि केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को सत्ता में बने रहने के लिए कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।

असम में इस बार मुकाबला काफी रोचक माना जा रहा है। यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल सकती है। कांग्रेस राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है, जबकि भाजपा अपने संगठन और पिछले कार्यकाल के आधार पर मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने का प्रयास कर रही है।
पश्चिम बंगाल में भी चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प रहने की संभावना है। यहां भारतीय जनता पार्टी तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने राज्य में अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया है, जिससे चुनावी मुकाबला पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया है।
केरल की राजनीति पर नजर डालें तो यहां लंबे समय से एक परंपरा चली आ रही थी कि एक बार वाम मोर्चा और दूसरी बार कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में आता था। हालांकि 2021 के चुनाव में यह परंपरा टूट गई और वाम मोर्चा लगातार दूसरी बार सत्ता में लौट आया। अब 2026 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के सामने फिर से सत्ता में वापसी की चुनौती है। इसके लिए कांग्रेस को अपने पारंपरिक वोट बैंक, विशेषकर ईसाई और मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास दोबारा हासिल करना होगा।
तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बीच मुख्य मुकाबला रहता है। राष्ट्रीय दलों की भूमिका यहां अधिकतर गठबंधन तक ही सीमित रहती है। भाजपा और कांग्रेस को इस राज्य में उत्तर भारत की हिंदी भाषी पार्टियों के रूप में देखा जाता है, इसलिए द्रविड़ दल इनसे राजनीतिक समझौते तो कर लेते हैं, लेकिन इनके जनाधार के विस्तार को लेकर सतर्क रहते हैं।

केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। यहां विधानसभा चुनाव का महत्व किसी राज्य के चुनाव से कम नहीं माना जाता। पुडुचेरी में कांग्रेस एक बार फिर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनौती देने की तैयारी में है। हालांकि यहां राजनीतिक समीकरण अक्सर बदलते रहते हैं, इसलिए चुनाव परिणामों का अनुमान लगाना आसान नहीं है।
जहां तक असम और पश्चिम बंगाल का सवाल है, वहां भी मुकाबला काफी दिलचस्प रहने वाला है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन राज्यों में सत्ताधारी दल संगठनात्मक रूप से काफी मजबूत हैं। ऐसे में सीटों की संख्या में बदलाव संभव है, लेकिन सत्ता परिवर्तन की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
आज का मतदाता पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और समझदार हो गया है। वह जाति, धर्म और भाषा जैसे संकीर्ण मुद्दों से ऊपर उठकर विकास और स्थिर शासन को प्राथमिकता देने लगा है। हालांकि राजनीतिक दल अभी भी इन भावनात्मक मुद्दों को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन युवा मतदाताओं में अब ऐसी प्रवृत्तियों का प्रभाव पहले की तुलना में कम होता दिखाई दे रहा है।
आने वाले दिनों में सभी राजनीतिक दल अपने-अपने चुनाव प्रचार को तेज करेंगे और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। अंततः लोकतंत्र के इस महापर्व में जनता ही यह तय करेगी कि किस दल को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी जाए। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति भी है और उसकी असली पहचान भी।








