कानपुर में अवैध किडनी प्रत्यारोपण के एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसने चिकित्सा व्यवस्था और मानवता दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त कार्रवाई में इस संगठित गिरोह का पर्दाफाश हुआ, जो पिछले करीब दो वर्षों से गैरकानूनी तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट का धंधा चला रहा था।
जांच में सामने आया है कि इस रैकेट में डॉक्टर, दलाल और कई निजी अस्पतालों के संचालक शामिल थे। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुड़ी एक महिला डॉक्टर, उसके पति समेत छह लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
कैसे चलता था पूरा खेल
प्राथमिक जांच में यह बात सामने आई है कि गिरोह जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पैसों का लालच देकर उनकी किडनी खरीदता था। इसके बाद इन्हीं किडनियों को अमीर मरीजों को भारी रकम लेकर ट्रांसप्लांट किया जाता था।
सूत्रों के अनुसार, गरीब लोगों से 5 से 10 लाख रुपये में किडनी खरीद ली जाती थी, जबकि उसी किडनी को मरीजों को 60 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक में बेचा जाता था। इस पूरे खेल में दलालों की भूमिका बेहद अहम थी, जो मरीजों और डोनरों के बीच संपर्क स्थापित करते थे।
बिना अनुमति चल रहा था ट्रांसप्लांट
जांच में यह भी सामने आया कि जिन अस्पतालों में किडनी प्रत्यारोपण किए जा रहे थे, उनके पास इस प्रकार की सर्जरी करने की वैध अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद वहां ऑपरेशन थिएटर में बाहरी टीम बुलाकर ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे।
बताया गया कि ऑपरेशन के दौरान विशेष उपकरण बाहर से लाए जाते थे और पूरी प्रक्रिया को गुप्त तरीके से अंजाम दिया जाता था। कई मामलों में मरीजों को अलग-अलग अस्पतालों में शिफ्ट कर इलाज का दिखावा भी किया जाता था, ताकि किसी को शक न हो।
कई राज्यों और विदेश तक फैले तार
इस मामले की जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह का नेटवर्क केवल एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार दिल्ली, नोएडा, मेरठ और अन्य शहरों तक फैले हुए थे।
इतना ही नहीं, एक विदेशी महिला का भी इसी नेटवर्क के जरिए अवैध किडनी प्रत्यारोपण किया गया था, जिससे यह साफ होता है कि यह रैकेट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय था।
सोशल मीडिया और ऐप्स के जरिए संपर्क
गिरोह के सदस्य आपस में संपर्क बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे। बताया गया कि आरोपी टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर आपस में जुड़े रहते थे और वहीं से डील तय होती थी।
यह तरीका उन्हें पुलिस की नजर से बचाने में मदद करता था, लेकिन आखिरकार एक शिकायत के बाद पूरा नेटवर्क उजागर हो गया।
शिकायत से खुला राज
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक युवक, जिसने अपनी किडनी बेची थी, को पूरी रकम नहीं मिली। उसने पुलिस से संपर्क किया और अपनी आपबीती बताई।
इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और क्राइम ब्रांच तथा स्वास्थ्य विभाग की टीमों के साथ मिलकर छापेमारी की। जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, जिसके बाद एक-एक कर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज
पुलिस ने इस मामले में मानव अंग प्रत्यारोपण से जुड़े कानूनों के तहत गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। आरोपियों पर अवैध अंग निकालने, खरीद-फरोख्त करने और लोगों को इसके लिए प्रेरित करने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषियों को 10 साल तक की सजा और भारी जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इसके अलावा मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े आरोपियों के लाइसेंस रद्द होने की भी संभावना है।
अस्पतालों पर कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग ने संबंधित अस्पतालों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। कुछ अस्पतालों को सील किया गया है, जबकि अन्य को नोटिस जारी कर संचालन रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ अस्पताल कागजों में बंद होने के बावजूद वास्तविकता में संचालित हो रहे थे, जो प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।
आगे की जांच जारी
पुलिस का कहना है कि इस मामले में अभी और भी खुलासे हो सकते हैं। कई आरोपी अभी फरार हैं, जिनकी तलाश में टीमें विभिन्न शहरों में दबिश दे रही हैं।
अधिकारियों के अनुसार, इस रैकेट से जुड़े अन्य अस्पतालों और डॉक्टरों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
कानपुर में सामने आया यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त खामियों और लालच के खतरनाक रूप को उजागर करता है। अवैध किडनी ट्रांसप्लांट जैसे गंभीर अपराध न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि मानवता के खिलाफ भी हैं।
प्रशासन की इस कार्रवाई से उम्मीद है कि ऐसे रैकेट्स पर लगाम लगेगी और भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सकेगा।








