मनोज मिड्ढा
कानपुर। सफेद कोट की आड़ में चल रहा काला कारोबार आखिरकार बेनकाब हो गया। कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर चल रहे बड़े रैकेट ने स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ अवैध ऑपरेशन का मामला नहीं, बल्कि इंसानियत को शर्मसार करने वाला वह खेल है, जिसमें गरीबों की मजबूरी को बाजार में बेचकर करोड़ों की कमाई की जा रही थी।

जांच में सामने आया है कि इस पूरे नेटवर्क ने नियमों को ठेंगा दिखाकर फर्जी रिश्तों का ऐसा जाल बुना, जिसमें डोनर और मरीज को कागजों पर भाई-बहन, रिश्तेदार और यहां तक कि पति-पत्नी तक बना दिया गया। असलियत में इनका आपस में कोई संबंध नहीं था, लेकिन कागजों की बाजीगरी से मेडिकल सिस्टम को धोखा दिया जाता रहा।
सूत्र बताते हैं कि इस रैकेट का नेटवर्क बेहद संगठित था। दलाल गांव-गांव घूमकर गरीब और बेरोजगार लोगों को तलाशते थे, उन्हें 2 से 5 लाख रुपये का लालच दिया जाता था, जबकि मरीजों से 25 से 30 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। इस खेल में हर स्तर पर मोटा कमीशन तय था और पूरी चेन बेहद गोपनीय तरीके से काम करती थी।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस नेटवर्क में कुछ चिकित्सा कर्मियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। आरोप है कि नियमों की अनदेखी कर ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया और दस्तावेजों की सत्यता की गंभीरता से जांच नहीं की गई। हालांकि, जांच एजेंसियां हर नाम और भूमिका की गहराई से पड़ताल कर रही हैं और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही खुलासे किए जा रहे हैं।
मामला सामने आने के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीमों ने कई ठिकानों पर छापेमारी की, जहां से संदिग्ध दस्तावेज, फर्जी पहचान पत्र और डिजिटल रिकॉर्ड बरामद हुए। कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कुछ मुख्य किरदार अब भी फरार बताए जा रहे हैं। इन फरार आरोपियों पर इनाम घोषित किए जाने की भी तैयारी है।
इस पूरे कांड ने यह भी उजागर कर दिया कि किस तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर संगठित अपराधी गिरोह लोगों की जान से खेल रहे हैं। गरीब व्यक्ति अपनी मजबूरी में अंग बेचने को तैयार होता है, जबकि अमीर मरीज जान बचाने के लिए किसी भी कीमत पर सौदा करने को मजबूर होता है और इसी बीच दलालों और नेटवर्क का खेल फलता-फूलता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि इस तरह के मामलों में Transplantation of Human Organs Act 1994 के तहत सख्त सजा का प्रावधान है, जिसमें कई साल की जेल और भारी जुर्माना शामिल है। यदि किसी डॉक्टर की संलिप्तता साबित होती है तो उसका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्यभर में किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रियाओं की समीक्षा शुरू कर दी है। सभी अस्पतालों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि बिना पूर्ण सत्यापन के कोई भी ट्रांसप्लांट न किया जाए।
कानपुर का यह किडनी कांड सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कब तक गरीबों की मजबूरी बिकती रहेगी और कब तक सफेद कोट के पीछे छिपे ऐसे काले सच सामने आते रहेंगे। जांच जारी है और आने वाले दिनों में इस काले कारोबार से जुड़े और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।








