सहारनपुर नगर निगम में तबादला विवाद: 6 माह बाद भी महिला अभियंता ने नहीं छोड़ा पद

सहारनपुर नगर निगम में तबादला विवाद गहराया। 6 महीने बाद भी महिला सहायक अभियंता ने पद नहीं छोड़ा। शिबू गिरी के सामने उठे सवाल, प्रशासन पर बढ़ा दबाव।

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर। नगर निगम में अभियंताओं के तबादले को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। सितंबर 2025 में हुए स्थानांतरण के बावजूद एक महिला सहायक अभियंता द्वारा अब तक कार्यभार न छोड़े जाने से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। करीब छह महीने बीत जाने के बाद भी संबंधित अभियंता अपने पद पर बनी हुई हैं, जबकि अन्य स्थानांतरित कर्मचारियों को काफी देरी के बाद कार्यमुक्त कर दिया गया था।

जानकारी के अनुसार, सितंबर 2025 में नगर निगम के कई अभियंताओं के तबादले किए गए थे। इस दौरान एक महिला सहायक अभियंता का स्थानांतरण वाराणसी किया गया था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। वहीं एक अवर अभियंता को इटावा भेजा गया था और एक जूनियर इंजीनियर का भी स्थानांतरण आदेश जारी हुआ था।

हालांकि अवर अभियंता और जेई को कई महीनों बाद कार्यमुक्त कर दिया गया, लेकिन महिला सहायक अभियंता अब तक पदभार छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इतना ही नहीं, उन्हें नगर निगम में गैराज की देखरेख की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंप दी गई है, जिससे मामले ने और तूल पकड़ लिया है।

नगर निगम में इस स्थिति को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। अधिकारियों और कर्मचारियों का कहना है कि स्थानांतरण आदेश के बाद भी पदभार न छोड़ना सेवा नियमों का उल्लंघन है। इस संबंध में नगर आयुक्त शिबू गिरी से भी शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।

सूत्रों का यह भी दावा है कि सत्ता के एक मंत्री महिला अभियंता के पक्ष में खड़े हैं, जिसके चलते उन्हें रिलीव नहीं किया जा रहा। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

दूसरी ओर, नगर निगम प्रशासन का कहना है कि स्टाफ की कमी के कारण कार्य प्रभावित हो रहा है। नगर आयुक्त शिबू गिरी के अनुसार, स्थानांतरण के बाद संबंधित पदों पर नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हो सकी है, जिससे कार्य सुचारु रूप से चलाने में दिक्कतें आ रही हैं। इसी वजह से तत्काल रिलीव नहीं किया जा रहा है।

नगर निगम में पहले से ही कर्मचारियों की कमी बताई जा रही है, जिससे विकास कार्य और दैनिक संचालन प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था और पारदर्शिता दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है।

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