शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। आम आदमी पार्टी की पूर्व प्रवक्ता एवं पूर्व पत्रकार हुदा जरीवाला गुरुवार को अपने अधिवक्ताओं के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचीं। सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट में अपने मामले की तारीख पर पेश होने के बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए अपने खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई, हिरासत और दर्ज मुकदमे की धाराओं को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले में कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपना पक्ष रखेंगी और उन्हें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है।
हुदा जरीवाला ने बताया कि 9 सितंबर को उन्हें सहारनपुर के सर्किट हाउस से हिरासत में लिया गया था। उनके मुताबिक, उन्हें धारा 151 के तहत हिरासत में लिया गया और इसके बाद दो रात जेल में रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जमानत बांड की व्यवस्था होने के बावजूद उनसे बेल बॉन्ड नहीं लिया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। जरीवाला के अनुसार, पुलिस ने उनका मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिया था। बाद में सहारनपुर, मुरादाबाद और दिल्ली के अधिवक्ताओं ने उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराई।
जरीवाला ने बताया कि 11 सितंबर को सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट से उन्हें जमानत मिली। उनकी गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने की कार्रवाई की उस समय भी रिपोर्टिंग हुई थी। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सहारनपुर पुलिस ने मस्जिद ध्वस्तीकरण को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जिलाधिकारी के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में कार्रवाई की थी तथा उन्हें शांतिभंग के आरोप में जेल भेजा गया था।
कलेक्ट्रेट पहुंचने के दौरान जरीवाला ने अपने पुराने बयान को लेकर भी सफाई दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सहारनपुर के जिलाधिकारी अरविंद कुमार चौहान के लिए ‘क्रिमिनल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। उनका कहना था कि कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को गिराने की कार्रवाई को वह ‘क्रिमिनल एक्टिविटी’ मानती हैं और इसी मुद्दे को लेकर आवाज उठाने के लिए सहारनपुर पहुंची थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बयान को अलग-अलग तरीके से पेश किया गया और इसी बयान के आधार पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया।
हुदा जरीवाला ने अधिवक्ता दुष्यंत सिंह की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे में भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 लगाए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उन्हें स्पष्ट नहीं है कि इस धारा के तहत मुकदमा किस आधार पर दर्ज किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने शिकायत के आधार पर बीएनएस की धारा 299 के तहत मामला दर्ज किया था।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने से संबंधित है। कानून में इसके लिए सजा का प्रावधान भी है। हालांकि, किसी विशेष मामले में धारा के तहत आरोप बनते हैं या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया में होता है।
जरीवाला ने बताया कि 17 सितंबर को इस मामले में उनकी पहली तारीख थी और वह अदालत में पेश हुईं। उन्होंने कहा कि वह अदालत, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा करती हैं। उनका कहना था कि वह कानूनी तरीके से अपना पक्ष रखेंगी और मामले की लड़ाई अदालत में जारी रखेंगी।
मस्जिद ध्वस्तीकरण का मामला भी इस बीच न्यायिक प्रक्रिया में है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संबंधित मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा है और मस्जिद से जुड़े 6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर फिलहाल रोक लगाई है। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित बताई गई है।
जरीवाला ने कहा कि उनका उद्देश्य मस्जिद ध्वस्तीकरण के मुद्दे पर अपनी बात रखना था और आगे भी वह अपना पक्ष कानूनी तरीके से रखेंगी। इस दौरान उनके अधिवक्ताओं सहित अन्य लोग मौजूद रहे।








