मनोज मिड्ढा
सहारनपुर। ऐतिहासिक मेला गुघाल का गुरुवार देर शाम विधिवत शुभारंभ हो गया। संसदीय कार्य राज्य मंत्री जसवंत सैनी, भाजपा के निवर्तमान प्रदेश मंत्री एवं संभल प्रभारी चंद्रमोहन तथा महापौर डॉ. अजय कुमार ने मेला द्वार पर रिबन काटकर मेले का उद्घाटन किया। इस अवसर पर जनप्रतिनिधियों, भाजपा पदाधिकारियों, नगर निगम अधिकारियों, पार्षदों और शहर के गणमान्य लोगों ने सहभागिता की।

उद्घाटन के दौरान जसवंत सैनी ने मेला गुघाल को आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति से जुड़ा आयोजन बताया। वहीं महापौर डॉ. अजय कुमार ने मेले में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर किए गए इंतजामों की जानकारी दी। मेला क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरों सहित अन्य व्यवस्थाएं की गई हैं, ताकि श्रद्धालुओं और दुकानदारों को किसी तरह की परेशानी न हो।
हालांकि इस बार मेले का शुभारंभ ऐसे समय हुआ है, जब कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर शहर में राजनीतिक और सामाजिक बहस चल रही है। इस प्रकरण के बाद कुछ मुस्लिम पार्षदों और समाजवादी पार्टी से जुड़े पार्षदों द्वारा मेले से दूरी बनाने की चर्चा सामने आई है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कुछ पार्षदों ने कार्यक्रमों के बहिष्कार का निर्णय लिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस बार मेला गुघाल के कार्यक्रमों में मुशायरा भी शामिल नहीं किया गया है, जबकि पहले यह मेले का हिस्सा रहा है।
उद्घाटन कार्यक्रम में मुस्लिम और समाजवादी पार्टी से जुड़े कुछ पार्षदों की गैरमौजूदगी को भी इसी पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति का कारण उसकी ओर से आधिकारिक रूप से स्पष्ट किया गया हो, तभी उसे निश्चित कारण के तौर पर माना जा सकता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं को फिलहाल चर्चा के रूप में ही देखा जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्षदों के बहिष्कार का मेले पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ता है। स्थानीय व्यापारियों और मेले से जुड़े लोगों के बीच इसे लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं। एक पक्ष का मानना है कि मेले में वर्षों से अलग-अलग समुदायों के लोग खरीदारी और मनोरंजन के लिए आते रहे हैं, इसलिए किसी राजनीतिक या सामाजिक विवाद का असर पूरे मेले की भीड़ पर पड़ना जरूरी नहीं है। दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है कि यदि किसी समुदाय के प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से मेले से दूरी बनाते हैं तो उसके समर्थकों और संबंधित वर्ग के लोगों की भागीदारी पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ सकता है।
मेला गुघाल केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि शहर के बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी शामिल है। ऐसे में आने वाले दिनों में मेले में पहुंचने वाली भीड़, दुकानदारों की बिक्री और विभिन्न वर्गों की भागीदारी से ही यह स्पष्ट होगा कि मौजूदा विवाद का मेले की गतिविधियों पर कोई वास्तविक असर पड़ा या नहीं।
फिलहाल प्रशासन और नगर निगम की कोशिश मेले को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से संचालित करने की है। महापौर ने पहले भी मेले को सामाजिक सौहार्द और समरसता का प्रतीक बताते हुए सभी वर्गों से भागीदारी की अपील की थी।
आने वाले दिनों में मेले में आने वाली भीड़ और कारोबार की स्थिति पर शहर की नजर रहेगी। खासकर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजनीतिक दूरी के बावजूद आम लोगों की भागीदारी किस स्तर पर रहती है और क्या इसका असर मेले के दुकानदारों तथा आयोजनों पर दिखाई देता है।








