नई दिल्ली। राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने अपने फैसले के पीछे 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा लिए गए निर्णय का हवाला दिया है। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस रुख को लेकर तीखा हमला बोला और इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ते हुए देशविरोधी फैसला करार दिया।

विवाद ऐसे समय में बढ़ा है, जब केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण आधिकारिक संस्करण के इस्तेमाल को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। फरवरी में गृह मंत्रालय ने निर्दिष्ट सरकारी एवं औपचारिक अवसरों पर राष्ट्रीय गीत के सभी छह अंतरों के आधिकारिक संस्करण के गायन/वादन संबंधी प्रोटोकॉल जारी किए थे। इसके बाद संसद ने ‘Prevention of Insults to National Honour’ कानून में संशोधन कर ‘वंदे मातरम्’ को भी राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनी संरक्षण के दायरे में शामिल किया।
अमित शाह का कांग्रेस पर हमला
गृह मंत्री अमित शाह ने 20 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस द्वारा केवल दो अंतरे गाने का निर्णय संसद द्वारा बनाए गए कानून की भावना के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस 1937 की अपनी कथित ऐतिहासिक भूल को दोहरा रही है और तुष्टीकरण की राजनीति के कारण राष्ट्रीय गीत को सीमित कर रही है।
अमित शाह ने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में ‘वंदे मातरम्’ को दो हिस्सों में बांटने का निर्णय लिया था और इसी तरह की राजनीति ने आगे चलकर देश के विभाजन की परिस्थितियों को मजबूत किया। उन्होंने कहा कि भाजपा कांग्रेस के इस रुख को जनता के बीच लेकर जाएगी।
कांग्रेस ने 1937 के प्रस्ताव को बनाया आधार
कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त 2026 को हुई बैठक में पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो अंतरे गाने के अपने पुराने निर्णय को दोहराया। पार्टी का कहना है कि यह निर्णय 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव के अनुरूप है।
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि 1937 में भी पार्टी ने पहले दो अंतरों को सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया था। उस समय कार्यसमिति ने गीत के कुछ हिस्सों को लेकर उठाई गई धार्मिक आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी 1937 के निर्णय में पहले दो अंतरों को सार्वजनिक अवसरों के लिए अपनाने की बात दर्ज है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस निर्णय का बचाव करते हुए कहा है कि कांग्रेस वही संस्करण गा रही है, जिसे महात्मा गांधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं के समय से पार्टी कार्यक्रमों में गाया जाता रहा है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा ‘वंदे मातरम्’ को राजनीतिक मुद्दा बना रही है।
1937 में क्या हुआ था?
‘वंदे मातरम्’ को लेकर 1937 का कांग्रेस कार्यसमिति का निर्णय मौजूदा विवाद के केंद्र में है। उस समय कार्यसमिति ने गीत के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्तियों का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय सभाओं में इसके पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की थी। दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि ‘वंदे मातरम्’ ने स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है।
विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में गीत के बाद के अंतरों में धार्मिक संदर्भों का होना भी शामिल है। इसी कारण कांग्रेस के 1937 के निर्णय में पहले दो अंतरों को सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए उपयुक्त माना गया था।
कानून और सरकारी दिशा-निर्देश में क्या बदलाव हुआ?
इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कानून और सरकारी प्रोटोकॉल को अलग-अलग समझना जरूरी है। केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में निर्धारित सरकारी एवं औपचारिक अवसरों पर ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के आधिकारिक संस्करण के गायन/वादन संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए थे।
इसके बाद संसद ने जुलाई 2026 में ‘Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026’ पारित किया। संशोधन के बाद ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय सम्मान कानून के तहत कानूनी संरक्षण मिला और इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने या व्यवधान पैदा करने पर दंड का प्रावधान किया गया। राष्ट्रपति की मंजूरी 11 अगस्त 2026 को मिलने के बाद यह कानून बना।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि सरकारी निर्धारित औपचारिक अवसरों पर पूर्ण आधिकारिक संस्करण को लेकर दिशा-निर्देश हैं, जबकि कानून का मुख्य प्रावधान जानबूझकर बाधा डालने और व्यवधान पैदा करने से संबंधित है। इसे हर निजी या राजनीतिक कार्यक्रम में सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य होने के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
इतिहास पर भी छिड़ी बहस
भाजपा नेताओं का कहना है कि 1937 में कांग्रेस का फैसला मुस्लिम लीग के दबाव में हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहले ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास पर चर्चा करते हुए 1937 के घटनाक्रम और मुस्लिम लीग की आपत्तियों का उल्लेख किया था।
दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि 1937 का निर्णय धार्मिक सौहार्द और उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया था तथा इसे आज के राजनीतिक संदर्भ में तुष्टीकरण से जोड़ना इतिहास को एकतरफा ढंग से देखना है। कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान करती है और उसके कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों का गायन लंबे समय से उसकी परंपरा का हिस्सा रहा है।
अब सियासी मुद्दा बन गया राष्ट्रगीत
‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। अब इसके गायन के तरीके और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। एक ओर भाजपा इसे राष्ट्रीय सम्मान और देशभक्ति से जोड़कर कांग्रेस पर हमला कर रही है, वहीं कांग्रेस अपने 1937 के प्रस्ताव और पार्टी की ऐतिहासिक परंपरा का हवाला दे रही है।
मौजूदा विवाद में सबसे अहम सवाल यही है कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान, सरकारी प्रोटोकॉल, कानूनी प्रावधान और राजनीतिक दलों की आंतरिक परंपराओं के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर राजनीतिक मंचों तक और अधिक गरमाने की संभावना है।








