Saharanpur News: जयंत चौधरी की 3 सितंबर की स्वाभिमान रैली पर सियासी नजरें, अखिलेश के ‘चवन्नी’ बयान का देंगे जवाब?

जयंत चौधरी 3 सितंबर को रामपुर मनिहारान में स्वाभिमान रैली को संबोधित करेंगे। रैली में मुस्लिम भागीदारी, रालोद के संगठनात्मक प्रभाव और अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ बयान पर संभावित जवाब को लेकर सियासी नजरें टिकी हैं।

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर। राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी 3 सितंबर को रामपुर मनिहारान स्थित गोचर महाविद्यालय में आयोजित स्वाभिमान रैली में शामिल होंगे। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच रालोद की इस रैली को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रैली को सफल बनाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने पूरी ताकत झोंक दी है।

राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या जयंत चौधरी रैली के मंच से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले बयान का राजनीतिक जवाब देंगे। हालांकि रालोद की ओर से अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और रालोद के बीच राजनीतिक प्रभाव को लेकर चल रही खींचतान के कारण जयंत चौधरी के भाषण पर सभी की निगाहें रहेंगी।

चंदन चौहान के कंधों पर रैली की जिम्मेदारी

गोचर महाविद्यालय में होने वाली स्वाभिमान रैली को सफल बनाने की जिम्मेदारी बिजनौर सांसद चंदन चौहान को सौंपी गई है। वह लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क कर लोगों को रैली में पहुंचने का आह्वान कर रहे हैं। उनके साथ रालोद विधायक अशरफ अली और प्रदेश सरकार में मंत्री अनिल कुमार भी तैयारियों में जुटे हैं।

रालोद के स्थानीय नेता गांव-गांव संपर्क, बैठक और नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से लोगों को रैली से जोड़ने में लगे हैं। पार्टी का लक्ष्य बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मौजूदगी के जरिए पश्चिमी यूपी में अपना राजनीतिक आधार प्रदर्शित करना है।

मुस्लिम भागीदारी पर खास नजर

स्वाभिमान रैली में मुस्लिम समाज की भागीदारी भी राजनीतिक विश्लेषण का प्रमुख केंद्र रहेगी। रालोद से जुड़े मुस्लिम विधायकों की सक्रियता और पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए रैली में इस समाज की मौजूदगी को पार्टी के सामाजिक विस्तार के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से मुस्लिम समाज के लोगों से संपर्क किए जाने और उन्हें रैली में शामिल होने के लिए आमंत्रित किए जाने की चर्चा है। हालांकि वास्तविक भागीदारी का आकलन रैली के बाद ही किया जा सकेगा।

यदि रैली में मुस्लिम समाज सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों की उल्लेखनीय भागीदारी रहती है तो इसे रालोद के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा सकता है। खासकर भाजपा के साथ गठबंधन की राजनीति के बीच रालोद का मुस्लिम समाज के बीच आधार बढ़ाने का प्रयास पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगामी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

क्या सपा को चुनौती देने की तैयारी?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, गुर्जर, मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूहों के समीकरण चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। रालोद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

ऐसे में स्वाभिमान रैली को केवल भीड़ जुटाने वाला कार्यक्रम नहीं, बल्कि पार्टी के सामाजिक और राजनीतिक आधार का आकलन करने के अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है। रैली में जुटने वाली भीड़, विभिन्न वर्गों की भागीदारी और जयंत चौधरी के भाषण से निकलने वाला राजनीतिक संदेश आने वाले दिनों की रणनीति के संकेत दे सकता है।

स्थानीय संगठन की सक्रियता भी बनेगी कसौटी

रैली की तैयारियों के बीच रालोद के स्थानीय संगठन और विभिन्न प्रकोष्ठों की सक्रियता भी चर्चा में है। पार्टी के स्थानीय और प्रदेश स्तर के नेता लगातार बैठकें और जनसंपर्क कार्यक्रम कर रहे हैं। वहीं संगठन के कुछ पदाधिकारियों की जमीनी सक्रियता को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाएं होने की बात भी सामने आ रही है।

फिलहाल 3 सितंबर की स्वाभिमान रैली रालोद के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शक्ति प्रदर्शन के साथ संगठन और सामाजिक समीकरणों की परीक्षा भी मानी जा रही है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि जयंत चौधरी मंच से सपा और अखिलेश यादव के संदर्भ में क्या राजनीतिक संदेश देते हैं तथा रैली में मुस्लिम समाज और अन्य वर्गों की भागीदारी किस स्तर तक रहती है।

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