Saharanpur News: नेशन बिल्डर्स अकादमी में योग के प्रयोग, बच्चों के जीवन में डिप्रेशन के लिए कोई जगह नहीं

सहारनपुर की नेशन बिल्डर्स अकादमी में योग आधारित शिक्षण पद्धति और यौगिक गतिविधियों के जरिए बच्चों में सकारात्मक सोच, उत्साह और मानसिक प्रफुल्लता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर। धैर्य की कमी, अवसाद यानि डिप्रेशन, आक्रामकता या फिर अंतर्मुखी हो रहना बच्चों का शैशव और तरुणाई छीन लेते हैं, साथ ही बच्चों का ऐसा होना माता पिता की चिंता का बड़ा कारण भी हैं। सेरोटोनिन और डोपामाइन दोनों ही न्यूरोट्रांसमीटर्स जो मूड, खुशी और अन्य शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करते हैं को योगाभ्यास और यौगिक व्यवहार से सामान्य स्थिति में लौटाया जा सकता है। इन्हें स्वस्थ रखने का उपाय योग में निहित है। नेशन बिल्डर्स एकेडमी के वरिष्ठ शिक्षक अजय सिंह यादव बताते हैं कि गुरुदेव पद्मश्री स्वामी भारत भूषण के द्वारा सुझाये गए नियमित योगाभ्यास और गुरुदेव का बच्चों से नियमित संवाद, जरा सा भी अच्छा करने वाले को प्रोत्साहन और उन्हें एकेडमी की सृजनात्मक गतिविधियों में भागीदारी के अवसर देने से संस्था में उत्साह का माहौल बच्चों में डोपामाइन स्टेम्युलेशन देता है जो प्रेरणा, पुरस्कार और संतुष्टि की भावना के लिए जिम्मेदार है। ये शरीर की गतिविधियों और समन्वय को नियंत्रित करता है और बच्चे अधिक बेहतर कर दिखाने के लिए प्रेरित होते है। शिक्षक अभिभावक संघ के अध्यक्ष एन के शर्मा जो जिला योग संघ के भी अध्यक्ष हैं ने बच्चों के विकास पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बताया कि यहां योग ओरिएंटेड शिक्षण पद्धति की वजह से बच्चों में मानसिक प्रफुल्लता का असर उनमें हैप्पी हार्मोंस के परिणाम के रूप में साफ देखने को मिलता है। मोक्षायतन अंतर्राष्ट्रीय योग संस्थान के प्रयोगों में ये देखने को मिला है कि जब हम कोई सफलता या निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो डोपामाइन का स्तर बढ़ता है, जिससे आपको अच्छा महसूस होता है और आप और अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित होते हैं। इसकी ज्यादातर उत्पत्ति मस्तिष्क में होती है। जबकि मूड, नींद, पाचन और भूख को नियंत्रित करने में खास भूमिका रखने वाला सेरोटोनिन जो लंबे समय तक चलने वाली खुशी और भलाई की भावना पैदा करता है, यह एकेडमी में दी जाने वाली लाफ्टर थेरेपी का नतीजा है इसका ज्यादातर उत्पादन आंत में होता है, हालांकि यह मस्तिष्क में भी काम करता है। इन दोनों को खुशी के हार्मोन कहा जाता है क्योंकि ये मनोदशा को सकारात्मक करने में योगदान करते हैं और अवसाद जैसी मानसिक स्थिति से हमारे बच्चों को बचाते हैं।

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