सहारनपुर मस्जिद प्रकरण: जमीयत उलेमा का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा, हाईकोर्ट जाने की तैयारी

सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में जमीयत उलेमा का प्रतिनिधिमंडल पहुंचा। मौलाना अमीनुल हक कासमी ने ध्वस्तीकरण पर कानूनी सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट जाने की बात कही।

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर, । कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऐतिहासिक मस्जिद को ढहाए जाने के बाद पैदा हुए हालात का जायजा लेने जमीयत उलेमा उत्तर प्रदेश का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल सोमवार को सहारनपुर पहुंचा। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद महमूद मदनी के निर्देश और प्रदेश अध्यक्ष मुफ्ती सैयद मुहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी की हिदायत पर पहुंचे प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रदेश महासचिव मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्लाह कासमी ने किया।

प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद कमेटी के सदस्यों, मुतवल्ली, खादिमों, स्थानीय उलेमाओं, बुद्धिजीवियों और शहर काजी नदीम अख्तर से मुलाकात की। इस दौरान मस्जिद और जमीन से संबंधित दस्तावेजों का जायजा लेने के साथ मामले के कानूनी एवं संवैधानिक पहलुओं पर चर्चा की गई।

पत्रकारों से बातचीत में मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्लाह कासमी ने कहा कि मस्जिद को जिस जल्दबाजी में ढहाया गया, उससे कई बुनियादी कानूनी सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रिमाइसेस एक्ट के तहत मस्जिद को सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा मानते हुए बेदखली का आदेश दिया था। इसके खिलाफ मस्जिद कमेटी ने जिला जज की अदालत में अपील की, जिसे खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा गया।

कासमी ने कहा कि मस्जिद पक्ष के अनुसार इसके बाद उच्च न्यायालय जाने के कानूनी रास्ते मौजूद थे। उनका सवाल है कि जब जमीन के स्वामित्व, मस्जिद के पुराने होने, राजस्व एवं नगर निगम रिकॉर्ड तथा वक्फ से संबंधित दस्तावेज अदालत के समक्ष रखे गए थे, तो इन सभी पहलुओं की पूरी जांच किए बिना ध्वस्तीकरण की कार्रवाई क्यों की गई।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष का दावा है कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में जमीन वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है तथा मस्जिद के वक्फ में पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज भी मौजूद हैं। जमीयत का कहना है कि इन दस्तावेजों की कानूनी स्थिति का अंतिम फैसला अदालत में होना चाहिए।

मौलाना कासमी ने 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट से जुड़े कानूनी सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि मस्जिद पक्ष का दावा है कि यह इबादतगाह 15 अगस्त 1947 से पहले भी मस्जिद के रूप में मौजूद थी। ऐसे में इस कानून के प्रावधानों की लागू होने की स्थिति की न्यायिक जांच आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि प्रशासन ध्वस्तीकरण को अदालती आदेशों का पालन बता रहा है, लेकिन यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अदालत के आदेश में तत्काल ध्वस्तीकरण का स्पष्ट निर्देश था या केवल पूर्व के बेदखली आदेश को बरकरार रखा गया था। जमीयत इस पहलू को भी उच्च न्यायालय के समक्ष उठाएगी।

कासमी ने कहा कि धार्मिक स्थल से जुड़ा मामला बेहद संवेदनशील होता है। ऐसे मामलों में प्रशासन को संयम और अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा मस्जिद कमेटी को कानूनी सहायता उपलब्ध कराएगी और आवश्यकता पड़ने पर मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।

उन्होंने मस्जिद के अंदर मौजूद सामान और धार्मिक वस्तुओं के नुकसान या गायब होने के आरोपों की भी जांच कराने की मांग की। कहा कि अनियमितता सामने आने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीयत का उद्देश्य तनाव बढ़ाना नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया के तहत न्याय और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

प्रतिनिधिमंडल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद आकिल कासमी, प्रदेश उपाध्यक्ष मुफ्ती मुहम्मद बिनयामीन कासमी, प्रदेश सचिव कारी अब्दुल मुईद चौधरी, जमीयत सद्भावना मंच के प्रदेश संयोजक मौलाना मूसा कासमी, जिला अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद गुलफाम मजाहिरी, जिला महासचिव मौलाना सरताज मजाहिरी सहित कई उलेमा और पदाधिकारी मौजूद रहे।

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