शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर सियासी और कानूनी गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेताओं और अधिवक्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल ने कमिश्नर से मुलाकात कर मस्जिद में हुई प्रशासनिक कार्रवाई के संबंध में ज्ञापन सौंपा। AIMIM के प्रवक्ता एवं अधिवक्ता शादाब चौहान ने कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए प्रशासन की प्रक्रिया और मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक को लेकर कई सवाल उठाए।

शादाब चौहान ने कहा कि AIMIM का प्रतिनिधिमंडल वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नेतृत्व में सहारनपुर आया है। उन्होंने बताया कि पार्टी के चीफ जनरल सेक्रेटरी और उत्तर प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में कमिश्नर से मुलाकात की गई तथा पूरे मामले से जुड़े बिंदुओं को ज्ञापन के माध्यम से रखा गया। उनका कहना था कि जिस तरीके से मस्जिद का ध्वस्तीकरण किया गया, उससे कार्रवाई की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने दावा किया कि जिस आदेश के आधार पर कार्रवाई की गई, उसमें सीधे तौर पर ध्वस्तीकरण का उल्लेख नहीं था। उनके अनुसार संबंधित पक्ष को कम से कम 15 से 90 दिन तक की प्रक्रिया का अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप आवश्यक बताते हुए कहा कि किसी भी पक्ष को उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक आदेश के बाद तत्काल ध्वस्तीकरण कर देना कानूनी प्रक्रिया के अंतिम उपायों के अधिकार पर सवाल खड़ा करता है।

AIMIM नेता ने Places of Worship Act, 1991 का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून के प्रावधानों को भी मामले में देखा जाना चाहिए। उन्होंने मस्जिद की भूमि के मालिकाना हक को लेकर भी सवाल उठाया। उनका दावा था कि वर्ष 1960 में यूनियन की ओर से मस्जिद के साथ लीज की गई थी। उन्होंने सवाल किया कि यदि जमीन लीज पर ली गई थी तो उसके मूल स्वामित्व और सरकारी स्वामित्व के दावे को दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।
शादाब चौहान ने कहा कि यदि प्रशासन की कार्रवाई बेदखली की प्रक्रिया के तहत थी तो उससे जुड़ी सुपुर्दगी और अन्य निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जल्दबाजी में कार्रवाई किए जाने से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने से पहले ही स्थिति बदल गई। उन्होंने सरकार पर कानून के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का हवाला भी दिया।

उन्होंने पुराने राजस्व अभिलेखों का जिक्र करते हुए कहा कि 1329 फसली में जमीन के संबंध में दर्ज विवरण की भी जांच होनी चाहिए। उनका दावा था कि सरकारी भूमि होने के दावे के समर्थन में अधिग्रहण, भुगतान या जमीन को सरकार के अधीन लेने से संबंधित रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि जमीन के स्वामित्व का फैसला केवल दावों से नहीं बल्कि उपलब्ध राजस्व और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर होना चाहिए।
AIMIM नेता ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में मस्जिदों से जुड़े मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए उठाया जा रहा है। उन्होंने सहारनपुर के स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी निशाना साधा और कहा कि यदि AIMIM का विधायक या सांसद यहां होता तो पार्टी इस कार्रवाई का राजनीतिक और कानूनी स्तर पर विरोध करती। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के पास फिलहाल यहां कोई विधायक या सांसद नहीं है, लेकिन इसके बावजूद वह मामले को कानूनी स्तर पर आगे ले जाएगी।
उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर मस्जिद कमेटी के साथ समन्वय किया जाएगा। कमेटी के पास मौजूद कानूनी दस्तावेजों और अन्य अभिलेखों को अधिवक्ताओं की टीम देखेगी। इसके बाद मामले में उपलब्ध सबसे मजबूत कानूनी विकल्प अपनाया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट में भी प्रभावी तरीके से पक्ष रखा जाएगा।
कलक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के मलबे के बीच मिली कुएं जैसी संरचना को लेकर उठ रहे सवालों पर भी शादाब चौहान ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पुराने धार्मिक स्थलों और परिसरों में कुएं या पानी की संरचना होना असामान्य नहीं है। हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वहां कुआं होना साबित भी हो जाता है तो इससे पूरे निर्माण की वैधता स्वतः सिद्ध नहीं होती। उन्होंने प्रशासन से यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि सरकारी परिसरों में मौजूद अन्य धार्मिक स्थलों की स्थिति क्या है और उनके संबंध में भी समान नियम लागू होते हैं या नहीं।
उन्होंने कहा कि केवल मस्जिदों को निशाना बनाए जाने की धारणा नहीं बननी चाहिए। उन्होंने मुरादाबाद और मेरठ समेत प्रदेश के अन्य स्थानों पर चल रहे धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए सरकार से सभी मामलों में समान कानूनी प्रक्रिया अपनाने की मांग की।
शादाब चौहान ने सरकार पर जनता का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों से हटाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने महिला सुरक्षा और सरकार की योजनाओं को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक मुद्दों को प्रमुखता देना उचित नहीं है।
मस्जिद कमेटी के अदालत जाने में देरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनके अधिवक्ता पूरे मामले की कानूनी स्थिति का अध्ययन करेंगे। कमेटी के साथ बैठक कर दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया जाएगा और उपलब्ध कानूनी विकल्पों में से सबसे प्रभावी रास्ता चुना जाएगा। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट में जो भी कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी, उसे अपनाया जाएगा और मामले को कानून के अंतिम उपलब्ध रास्ते तक ले जाया जाएगा।
AIMIM प्रतिनिधिमंडल के कमिश्नर से मिलने के बाद अब इस मामले में राजनीतिक बयानबाजी के साथ कानूनी गतिविधियां भी तेज होने के संकेत हैं। प्रशासन की ओर से कार्रवाई को लेकर पहले से सामने आए आदेश और अदालतों में हुई कार्यवाही के आधार पर अपना पक्ष रखा जा चुका है। ऐसे में आगे की स्थिति अदालत में होने वाली सुनवाई और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण से स्पष्ट होगी।








