शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। केंद्र सरकार द्वारा गन्ने के एफआरपी (फेयर एंड रेम्युनरेटिव प्राइस) में मात्र ₹10 प्रति कुंतल की बढ़ोतरी किए जाने के फैसले ने किसान संगठनों में असंतोष पैदा कर दिया है। भारतीय किसान यूनियन वर्मा एवं पश्चिम प्रदेश मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भगत सिंह वर्मा ने इस वृद्धि को किसानों के साथ “बड़ा धोखा” करार देते हुए प्रधानमंत्री से इस विषय पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।
सहारनपुर स्थित संगठन के कार्यालय पर आयोजित एक बैठक में भगत सिंह वर्मा ने कहा कि वर्तमान में ₹365 प्रति कुंतल निर्धारित एफआरपी न तो किसानों की लागत को पूरा करता है और न ही उन्हें लाभ प्रदान करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, तब मात्र ₹10 की वृद्धि किस प्रकार देश के करोड़ों गन्ना किसानों के लिए राहत साबित होगी। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस निर्णय से किसानों को वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा।
वर्मा ने विभिन्न राज्यों के गन्ना मूल्य का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य ₹400 प्रति कुंतल, हरियाणा में ₹415 और पंजाब में ₹416 प्रति कुंतल है। उन्होंने यह भी बताया कि पंजाब सरकार द्वारा इस वर्ष ₹67.50 प्रति कुंतल और हरियाणा सरकार द्वारा ₹18 प्रति कुंतल बोनस दिया गया है, जो किसानों को अतिरिक्त राहत प्रदान करता है। इसके मुकाबले केंद्र सरकार की ओर से की गई मामूली वृद्धि किसानों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती।
उन्होंने आरोप लगाया कि गन्ने की उत्पादन लागत लगभग ₹550 प्रति कुंतल तक पहुंच चुकी है, ऐसे में वर्तमान एफआरपी किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने एफआरपी तय करने के लिए रिकवरी दर को 8.50 प्रतिशत से बढ़ाकर 10.25 प्रतिशत कर दिया है, जिससे सीधे तौर पर चीनी मिलों को लाभ मिल रहा है, जबकि किसानों को इसका कोई विशेष फायदा नहीं मिल पा रहा।
भगत सिंह वर्मा ने गन्ने से बनने वाले विभिन्न उत्पादों का उल्लेख करते हुए कहा कि चीनी, शीरा, बगास, प्रेसमड और अल्कोहल जैसे उत्पादों से सरकार और उद्योग को भारी मुनाफा होता है। इसके बावजूद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि गन्ना किसानों को कम से कम ₹700 प्रति कुंतल का लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाए, जिससे उनकी लागत और मुनाफा दोनों सुनिश्चित हो सकें।
इसके साथ ही उन्होंने गन्ना भुगतान की व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिलना एक बड़ी समस्या है। उन्होंने सरकार से मांग की कि गन्ने का भुगतान अधिकतम 14 दिनों के भीतर सुनिश्चित किया जाए, ताकि किसानों को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।

बैठक में केंद्र और प्रदेश सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए वर्मा ने कहा कि दोनों सरकारें मिलकर गन्ना किसानों के हितों की अनदेखी कर रही हैं और चीनी मिलों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में विफल रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसानों की मांगों को जल्द पूरा नहीं किया गया, तो संगठन व्यापक आंदोलन करने को मजबूर होगा।
बैठक की अध्यक्षता राष्ट्रीय सलाहकार हाफिज मूर्तजा त्यागी ने की, जबकि संचालन प्रदेश सचिव ऋषि पाल गुर्जर ने किया। इस दौरान राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. अशोक मलिक, प्रदेश उपाध्यक्ष पंडित नीरज कपिल, प्रदेश संगठन मंत्री धर्मवीर चौधरी, प्रदेश सचिव मास्टर रईस अहमद, जिला संगठन मंत्री सुरेंद्र सिंह एडवोकेट, जिला उपाध्यक्ष वसीम जहीरपुर, प्रदेश मीडिया प्रभारी दुष्यंत सिंह सहित कई पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता मौजूद रहे।
कुल मिलाकर, गन्ना किसानों के मुद्दे पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह असंतोष बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और किसानों की मांगों को किस हद तक पूरा करती है।








