शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। मुहर्रम का चांद दिखाई देने के साथ ही इस्लामी हिजरी वर्ष 1448 का आगाज हो गया। शहर और आसपास के क्षेत्रों में शिया समुदाय ने गम और अकीदत के साथ मुहर्रम की रस्मों की शुरुआत की। विभिन्न इमामबाड़ों में मजलिसों, नौहाखानी, मातम और अलम के जुलूसों का आयोजन किया गया। हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और करबला के 72 शहीदों की याद में श्रद्धालुओं ने अलम और ताजिए सजाकर उन्हें अकीदत के साथ पेश किया।
मुहर्रम की पहली तारीख के साथ ही शहर का माहौल अजादारी में रंग गया। अंजुमन इमामिया की ओर से बड़तला अंसारियान से अलम का जुलूस निकाला गया, जबकि अंजुमन अकबरिया द्वारा मोहल्ला ख्वाजा जादगान से अलम बरामद कर इमामबाड़ा अंसारियान तक पहुंचाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने मातम कर करबला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। अंजुमन-ए-सोगवारे अकबरिया के सदस्यों ने भी जुलूस में शामिल होकर नौहाखानी और मातम किया।
इमाम बारगाह सामानियान में आयोजित मजलिस में आसिफ अल्वी, हमजा जैदी और सलीम आब्दी ने मर्सियाखानी कर करबला के दर्दनाक वाकये को पेश किया। मजलिस को संबोधित करते हुए हुज्जत-उल-इस्लाम मौलाना हसन हैदर सादिकी ने कहा कि करबला का संदेश केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि इंसानियत, सत्य, न्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का अमर संदेश है। उन्होंने कहा कि हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने परिवार और साथियों सहित शहादत देकर पूरी मानवता को यह सिखाया कि अन्याय और जुल्म के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए।
मौलाना सादिकी ने कहा कि जहां ईद का चांद खुशियों और उत्सव का संदेश लेकर आता है, वहीं मुहर्रम का चांद करबला की याद और गम का एहसास दिलाता है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत पूरी दुनिया के लिए सत्य और इंसाफ की राह पर चलने की प्रेरणा है। करबला का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1400 वर्ष पूर्व था।
उन्होंने लोगों से आपसी भाईचारा, प्रेम, सहिष्णुता और मानवता की भावना को मजबूत करने का आह्वान करते हुए कहा कि समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। इमाम हुसैन का जीवन त्याग, बलिदान और मानव मूल्यों की रक्षा का सर्वोच्च उदाहरण है।
मुहर्रम के अवसर पर शहर के विभिन्न इमामबाड़ों में मजलिसों का आयोजन देर रात तक चलता रहा। श्रद्धालुओं ने नौहाखानी और मातम के माध्यम से करबला के शहीदों को याद किया। आगामी दिनों में मुहर्रम की विभिन्न रस्मों, मजलिसों और मातमी जुलूसों का सिलसिला जारी रहेगा, जिसके लिए इमामबाड़ों और अंजुमनों द्वारा तैयारियां भी पूरी कर ली गई हैं।
धार्मिक वातावरण और गमगीन फिजा के बीच मुहर्रम की शुरुआत ने एक बार फिर करबला के उस महान बलिदान की याद ताजा कर दी, जिसने मानवता को अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और सत्य के मार्ग पर डटे रहने का संदेश दिया।








