शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। मोहर्रम की नौवीं तारीख पर सहारनपुर के विभिन्न इमामबाड़ों और अजाखानों में आयोजित मजालिस में हजरत अली असगर अलैहिस्सलाम की शहादत का मार्मिक वर्णन किया गया। उलेमा ने कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके छह माह के मासूम बेटे हजरत अली असगर की कुर्बानी पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए इंसानियत, सब्र और हक की राह पर चलने का संदेश दिया। मजालिस के दौरान सोगवारों की आंखें नम हो गईं और पूरा माहौल गमगीन बना रहा।
शहर के इमामबाड़ों में सुबह से ही अकीदतमंदों का आना-जाना शुरू हो गया था। विभिन्न स्थानों पर आयोजित मजालिस में सबसे पहले मरसियाखानी की गई, जिसमें आसिफ अल्वी, सलीस हैदर काजमी, अनवर अब्बास जैदी, हमजा जैदी, सलीम आब्दी और ख्वाजा रईस अब्बास सहित अन्य मरसियाख्वानों ने कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया।
पहली मजलिस इमामबाड़ा सामानियान, मोहल्ला कायस्थान में आयोजित हुई, जहां मौलाना हसन हैदर सादिकी ने खिताब किया। दूसरी मजलिस बड़ा इमामबाड़ा जाफर नवाज में हुई, जिसमें मौलाना सैय्यद तहकीक हुसैन रिजवी ने कर्बला के संदेश पर प्रकाश डाला। तीसरी मजलिस छोटा इमामबाड़ा अंसारियान में आयोजित हुई, जहां मौलाना जहूर मेहदी मौलाई ने हजरत अली असगर की शहादत के विभिन्न पहलुओं को बयान किया। वहीं लिंक रोड स्थित आसिफ अली हवारी के निवास पर आयोजित मजलिस को भी मौलाना सैय्यद तहकीक हुसैन रिजवी ने संबोधित किया।
उलेमा ने अपने संबोधन में कहा कि कर्बला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए दी गई महान कुर्बानी का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि हजरत अली असगर की शहादत मानवता को यह संदेश देती है कि अत्याचार और अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए।
मजालिस के समापन पर नौहाखानी और सीनाजनी का आयोजन हुआ। अंजुमन अकबरिया, सोगवारे अंजुमन अकबरिया और अंजुमन इमामिया के सदस्यों ने दर्दभरे नौहे पढ़कर कर्बला के शहीदों को याद किया। नौहाखानी के दौरान बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने मातम कर अपने गम का इजहार किया।
मोहर्रम की नौवीं रात के मद्देनजर शहर के विभिन्न इमामबाड़ों और अजाखानों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया। चौक गुलवो का, बड़ा तला मोहल्ला अंसारियान, मकामे पीर साहब मोहल्ला चौधरियान और मोहल्ला ख्वाजा जादगान सहित कई स्थानों पर ताजिए सजाए गए। देर रात तक अकीदतमंद शब्बेदारी में शामिल होकर इबादत और अजादारी करते रहे।
इस अवसर पर वक्फ जनाना इमामबाड़ा हाजी सादिक हुसैन, मशहूर हज्जन तुल्ली में आयोजित जनानी मजलिस के बाद हजरत अली असगर अलैहिस्सलाम का झूला (पालना) भी निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने शिरकत कर अपनी अकीदत पेश की।
मोहर्रम की नौवीं तारीख पर आयोजित इन धार्मिक कार्यक्रमों ने कर्बला के अमर संदेश को एक बार फिर जीवंत कर दिया और लोगों को त्याग, बलिदान तथा इंसानियत की राह पर चलने की प्रेरणा दी।








