Saharanpur News: कलक्ट्रेट मस्जिद मामले में स्टे पर फैसला सुरक्षित, जिला जज की अदालत में दोनों पक्षों की 45 मिनट तक चली बहस

कलक्ट्रेट मस्जिद मामले में जिला जज की अदालत ने स्टे पर फैसला सुरक्षित रखा। मस्जिद पक्ष ने वक्फ संपत्ति और 1991 वर्शिप एक्ट का हवाला दिया, जबकि सरकार ने राजस्व अभिलेखों के आधार पर अपना पक्ष रखा। मामले में हाईकोर्ट में कैविएट भी दाखिल की गई।

शहरी चौपाल ब्यूरो 

सहारनपुर, दैनिक शहरी चौपाल। कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद प्रकरण में जिला जज की अदालत में शुक्रवार को भी सुनवाई जारी रही। करीब 45 मिनट तक चली सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष और शासकीय पक्ष ने अपने-अपने तर्क विस्तार से अदालत के समक्ष रखे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मस्जिद पक्ष की ओर से मांगे गए स्टे (स्थगन) पर अपना निर्णय सुरक्षित (रिजर्व) रख लिया है।

यह मामला 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा दिए गए उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें कलक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को अवैध निर्माण करार देते हुए 30 दिनों के भीतर हटाने का निर्देश दिया गया था। साथ ही मस्जिद पक्ष पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मस्जिद पक्ष ने जिला जज की अदालत में अपील दायर की है।

शुक्रवार को हुई सुनवाई में मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता मोहम्मद तारीक सिद्दीकी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि संबंधित मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में विधिवत पंजीकृत है और इसलिए यह वक्फ संपत्ति की श्रेणी में आती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार वक्फ से संबंधित प्राधिकरण एवं सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 के अनुसार 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में रहे धार्मिक स्थलों की स्थिति को यथावत बनाए रखने का प्रावधान है, इसलिए इस मामले में भी उक्त कानून के प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष ने शासकीय अधिवक्ता द्वारा 6.41 करोड़ रुपये की कोर्ट फीस जमा कराने संबंधी प्रार्थना पत्र पर भी आपत्ति दर्ज कराई। अदालत ने इस आपत्ति पर विचार करते हुए शासकीय अधिवक्ता की ओर से प्रस्तुत संबंधित प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया।

दूसरी ओर शासकीय अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष राजस्व अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि फसली वर्ष 1324 और 1359 के रिकॉर्ड में संबंधित भूमि कलक्टरी के नाम दर्ज है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी राजस्व अभिलेख में मस्जिद का नाम दर्ज नहीं है। सरकार की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि विपक्ष द्वारा प्रस्तुत नगर पालिका के रिकॉर्ड स्वामित्व (मिल्कियत) के दस्तावेज नहीं माने जा सकते, इसलिए उन्हें भूमि स्वामित्व का आधार नहीं माना जा सकता।

दोनों पक्षों के विस्तृत तर्क सुनने के बाद जिला जज की अदालत ने फिलहाल स्टे आवेदन पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के निर्णय पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं।

इधर, इस मामले के शिकायतकर्ता और बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने भी हाईकोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल की है। उन्होंने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। कैविएट के माध्यम से उन्होंने प्रार्थना की है कि यदि इस मामले से संबंधित कोई याचिका उच्च न्यायालय में दायर होती है तो निर्णय लेने से पहले उनके पक्ष को भी सुनने का अवसर प्रदान किया जाए।

कलक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण सहारनपुर के चर्चित मामलों में शामिल हो चुका है और इस पर जिला अदालत के साथ-साथ संभावित उच्च न्यायालयी कार्यवाही पर भी सभी की नजर बनी हुई है।

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