Saharanpur News: हादसे के बाद क्यों जागता है प्रशासन? कोचिंग सेंटर से पटाखा फैक्ट्री तक उठे बड़े सवाल, अब जवाबदेही तय करने का वक्त

पटाखा फैक्ट्री हादसे के बाद प्रशासन की कार्रवाई पर बड़े सवाल। क्या दुर्घटना के बाद ही जागेगा सिस्टम? जानिए क्यों जरूरी है नियमित फायर सेफ्टी ऑडिट, निरीक्षण, लाइसेंस जांच और प्रशासनिक जवाबदेही।

मनोज मिड्ढा 

सहारनपुर। सहारनपुर में हाल ही में हुए पटाखा फैक्ट्री विस्फोट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन केवल किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही सक्रिय होता है? इससे पहले लखनऊ के अलीगंज स्थित कोचिंग सेंटर में अग्निकांड के बाद भी पूरे प्रदेश में कोचिंग संस्थानों की जांच का अभियान चला था। सहारनपुर में भी कई कोचिंग सेंटरों की जांच हुई, कुछ को नोटिस दिए गए और कुछ को सील किया गया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद अभियान ठंडा पड़ गया। अब पटाखा फैक्ट्री हादसे के बाद फिर जांच शुरू हो गई है।


यह घटनाक्रम केवल एक फैक्ट्री या एक कोचिंग सेंटर का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि नियमित निरीक्षण, लाइसेंस की समय-समय पर समीक्षा और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाता, तो संभव है कि कई हादसों को पहले ही रोका जा सकता था।
पटाखा फैक्ट्री मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी इकाई को सीमित मात्रा में विस्फोटक सामग्री रखने का लाइसेंस मिला था, तो वहां कथित रूप से उससे अधिक मात्रा में विस्फोटक कैसे पहुंचा? क्या संबंधित विभागों द्वारा नियमित निरीक्षण किए जा रहे थे? यदि किए गए, तो उनकी रिपोर्ट क्या कहती है? यदि नहीं किए गए, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
इसी प्रकार शहर के अनेक होटल, बैंक्वेट हॉल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, गोदाम और भीड़भाड़ वाले बाजार आज भी अग्नि सुरक्षा की दृष्टि से चुनौती बने हुए हैं। कई स्थानों पर संकरी गलियां हैं, जहां आपात स्थिति में दमकल वाहन पहुंचना भी कठिन हो सकता है। कई बहुमंजिला भवनों में पर्याप्त आपातकालीन निकास, अग्निशमन यंत्र या पार्किंग व्यवस्था तक नहीं है।


यह भी देखा जाना चाहिए कि कितने व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप संचालित हो रहे हैं। यदि किसी भवन का नक्शा आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत हुआ था और उसमें व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं, तो संबंधित विभागों ने समय रहते क्या कार्रवाई की? ऐसे प्रश्न केवल किसी एक विभाग से नहीं बल्कि समन्वित प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं।
पटाखा फैक्ट्रियों, रसायन भंडारण स्थलों और अन्य संवेदनशील इकाइयों के बाहर स्पष्ट रूप से यह प्रदर्शित होना चाहिए कि वहां किस प्रकार का लाइसेंस है, अधिकतम कितनी मात्रा में सामग्री रखने की अनुमति है, अग्निशमन व्यवस्था क्या है और आपातकालीन संपर्क नंबर कौन-कौन से हैं। इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी और स्थानीय लोगों में जागरूकता भी आएगी।
सहारनपुर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में केवल हादसे के बाद अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि सुरक्षा व्यवस्था को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए। यदि हर छह माह या वर्ष में अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट हो, तो जोखिम काफी हद तक कम किए जा सकते हैं।

trfgcvkj.blkjhgfd

Leave a Comment

और पढ़ें

Horoscope

Weather

और पढ़ें
error: Content is protected !!

राज्य