देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। बीमारी के बाद लगातार लोगों से मुलाकात और जनसंपर्क के बीच कांग्रेस नेतृत्व की ओर से उन्हें पार्टी के तय कार्यक्रमों के अनुरूप सक्रिय रहने की सलाह दिए जाने की चर्चा है। इसके बावजूद रावत की सक्रियता जारी रहने से उनकी अगली राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
हरीश रावत का कहना है कि वह कोई अलग राजनीतिक यात्रा नहीं निकाल रहे हैं। दिल्ली में इलाज के दौरान और उसके बाद कई समर्थकों एवं शुभचिंतकों ने उनसे मिलने की इच्छा जताई थी। इसी क्रम में वह अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों से मुलाकात कर रहे हैं। हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी इस सक्रियता को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।
हरीश रावत का चुनावी रिकॉर्ड पिछले कुछ वर्षों में उनके पक्ष में नहीं रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में वह हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दोनों सीटों से चुनाव हार गए थे। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में लालकुआं सीट से भी वह जीत दर्ज नहीं कर सके। इसके बावजूद उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में उनकी सक्रियता लगातार बनी हुई है।
रावत की मौजूदा सक्रियता का एक अहम पहलू उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका भी है। उनकी बेटी अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण से कांग्रेस विधायक हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनके बड़े बेटे वीरेंद्र रावत को हरिद्वार सीट से उम्मीदवार बनाया था, हालांकि वह चुनाव नहीं जीत सके। अब छोटे बेटे आनंद रावत को लेकर हरीश रावत खुलकर अपनी इच्छा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने पार्टी से उचित सीट पर आनंद के नाम पर विचार करने की पैरवी की है।
इसी वजह से उनकी जनसंपर्क गतिविधियों को रावत परिवार की अगली राजनीतिक पारी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या हरीश रावत 2027 में केवल कांग्रेस की सत्ता वापसी के लिए सक्रिय हैं या साथ ही अपने परिवार की अगली पीढ़ी के लिए भी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं।
इस बीच प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े मामले ने भी रावत की राजनीतिक सक्रियता को चर्चा में रखा है। 2016 की वीपीडीओ भर्ती से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत से भी पूछताछ की गई। रावत ने इस कार्रवाई के पीछे राजनीतिक मंशा होने का आरोप लगाया है।
कांग्रेस के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हरीश रावत जैसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता की सक्रियता को किस तरह पार्टी की आधिकारिक रणनीति के साथ जोड़ा जाए। चुनाव से पहले यदि पार्टी के समानांतर अलग-अलग शक्ति केंद्र दिखाई देते हैं तो इससे संगठनात्मक स्तर पर असहजता पैदा हो सकती है।
2027 का चुनाव हरीश रावत के लिए केवल कांग्रेस की सत्ता में वापसी का अवसर नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उनके राजनीतिक प्रभाव और रावत परिवार की अगली पीढ़ी की भूमिका तय करने वाला चुनाव भी हो सकता है। अब निगाह इस बात पर है कि रावत अपनी सक्रियता को कांग्रेस के सामूहिक चुनावी अभियान के साथ जोड़ते हैं या अपने और परिवार के लिए अलग राजनीतिक जमीन तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।








