शहरी चौपाल ब्यूरो
देवबंद। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि भारत में मुसलमानों का अस्तित्व किसी की कृपा या मेहरबानी पर निर्भर नहीं है। देश की आजादी में उनके पूर्वजों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और बड़े बलिदान दिए हैं। ऐसे में मुसलमानों को अपने ही देश में बाहरी या दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश कभी सफल नहीं होगी।
हरियाणा के नूंह जिले के गांव पिपाका में आयोजित जमीयत उलमा-ए-हिंद की गवर्निंग काउंसिल की बैठक को संबोधित करते हुए मौलाना मदनी ने देश में बढ़ती नफरत की घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एक वर्ष में नफरत फैलाने वाले भाषणों की 1600 से अधिक घटनाएं सामने आईं, लेकिन इनमें 87 प्रतिशत मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत में मुसलमान होना अपराध हो गया है।
मौलाना मदनी ने कहा कि देश में लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। धर्म के नाम पर किसी एक समुदाय के खिलाफ होने वाले अत्याचार को राष्ट्रीय गौरव के रूप में पेश करना चिंताजनक है। इसका प्रभाव केवल अल्पसंख्यक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि दलितों, वंचितों और कानून के शासन की व्यवस्था भी इससे प्रभावित हो रही है।
उन्होंने कहा कि देश में खतरा बहुसंख्यक समुदाय को नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख से पैदा हो रहा है। लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए सभी वर्गों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
बैठक में वक्फ संपत्तियों के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। गवर्निंग काउंसिल ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 के मौजूदा स्वरूप पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार से इस पर पुनर्विचार करने की मांग की। साथ ही वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और उनके बेहतर प्रबंधन के लिए स्वतंत्र संस्था गठित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।







