मनोज मिड्ढा
सहारनपुर। सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और स्नेह का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं की लंबी परंपरा भी जुड़ी हुई है। भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने और बहन की रक्षा का संकल्प लेने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। सनातन धर्म से जुड़ी कथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहां रक्षा सूत्र विश्वास, समर्पण और सुरक्षा का प्रतीक बनकर सामने आता है।
हर वर्ष सावन पूर्णिमा के दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी दीर्घायु, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर सुख-दुख में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है। हालांकि रक्षाबंधन को लेकर कई पौराणिक एवं ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनके विवरण अलग-अलग धार्मिक एवं लोक परंपराओं में भिन्न रूप में मिलते हैं।
देवासुर संग्राम में इंद्राणी ने इंद्र को बांधा रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक मान्यता देवासुर संग्राम से संबंधित है। कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच हुए भीषण युद्ध में एक समय असुरों का पलड़ा भारी पड़ने लगा। देवराज इंद्र भी संकट में थे। देवताओं की चिंता को देखते हुए इंद्राणी यानी शची ने भगवान विष्णु की आराधना की।
मान्यता है कि इंद्राणी ने मंत्रोच्चार से अभिमंत्रित पवित्र रक्षा सूत्र तैयार किया और देवराज इंद्र की कलाई पर बांधा। इसके बाद इंद्र के भीतर आत्मविश्वास और साहस का संचार हुआ और उन्होंने असुरों के विरुद्ध विजय प्राप्त की। इस कथा को संकट के समय रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
यमुना ने यमराज को बांधा रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन से जुड़ा एक अन्य लोकप्रिय धार्मिक प्रसंग सूर्यपुत्री यमुना और यमराज से संबंधित है। पौराणिक कथा के अनुसार यमुना अपने भाई यमराज से मिलने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब यमराज उनके घर पहुंचे तो यमुना ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया और विधि-विधान से पूजा करने के बाद उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।
बहन के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। मान्यता है कि उन्होंने कहा कि जो बहन श्रद्धा और प्रेम से अपने भाई को रक्षा सूत्र बांधेगी, उसके भाई को दीर्घायु और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होगा। इसी कथा के आधार पर रक्षाबंधन को भाई की लंबी आयु और कल्याण की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
राजा बलि को भाई बनाकर भगवान विष्णु को वापस लाई थीं माता लक्ष्मी
रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और दानवीर राजा बलि से संबंधित है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। तीन पग में समस्त लोक नाप लेने के बाद भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें पाताल लोक में साथ रहने का वचन दिया।
जब भगवान विष्णु लंबे समय तक बैकुंठ नहीं लौटे तो माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। कथा के अनुसार वह साधारण स्त्री का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचीं और उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया।
राजा बलि ने बहन से उपहार मांगने को कहा तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बैकुंठ वापस भेजने का अनुरोध किया। राजा बलि ने बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को बैकुंठ जाने की अनुमति दे दी। यह कथा रक्षाबंधन को प्रेम, विश्वास और रिश्तों के सम्मान से जोड़ती है।
द्रौपदी और श्रीकृष्ण का रक्षा सूत्र
महाभारत से जुड़ी द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की कथा रक्षाबंधन के संदर्भ में सबसे अधिक प्रचलित प्रसंगों में शामिल है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार शिशुपाल वध के दौरान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई और रक्त बहने लगा।
यह देखकर द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह और समर्पण से श्रीकृष्ण भावुक हुए और उन्होंने उनकी रक्षा का वचन दिया।
आगे चलकर महाभारत के प्रसंग में जब कौरव सभा में द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास हुआ, तब मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण ने उनकी लाज की रक्षा की। इस कथा को भाई-बहन के पारंपरिक रिश्ते से अलग एक ऐसे आत्मीय बंधन के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें स्नेह और रक्षा का संकल्प सबसे महत्वपूर्ण है।
रानी कर्णावती और हुमायूं की चर्चित ऐतिहासिक कथा
रक्षाबंधन से जुड़ा एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक लोकप्रसंग चित्तौड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं से संबंधित है। प्रचलित कथा के अनुसार गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता की अपील की थी।
हालांकि इस घटना के दस्तावेजी प्रमाणों और इसके वास्तविक स्वरूप को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं। इसलिए इसे प्रमाणित इतिहास की बजाय प्रचलित ऐतिहासिक लोककथा के रूप में देखा जाता है। फिर भी यह प्रसंग रक्षाबंधन के उस व्यापक संदेश को सामने रखता है कि रक्षा और विश्वास का रिश्ता जाति, धर्म और सीमाओं से ऊपर मानवीय भावनाओं से जुड़ सकता है।
रक्षा सूत्र में छिपा है विश्वास और जिम्मेदारी का संदेश
रक्षाबंधन की इन कथाओं में भले ही अलग-अलग पात्र और परिस्थितियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही भावना दिखाई देती है—विश्वास, स्नेह, समर्पण और रक्षा का संकल्प। यही कारण है कि समय के साथ रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का पर्व न रहकर सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में प्रेम एवं जिम्मेदारी की भावना मजबूत करने वाला त्योहार बन गया है।
आज भी बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो उसके पीछे केवल एक धागा नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मंगलकामना की भावना होती है। भाई के लिए भी यह अवसर बहन के सम्मान, सुरक्षा और सुख-दुख में साथ निभाने के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।








