मथुरा। देशभर में शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों से लेकर घरों तक भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विशेष तैयारियां की गई हैं। श्रद्धालु व्रत रखकर दिनभर पूजा-अर्चना कर रहे हैं और मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएंगे। मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भी जन्माष्टमी को लेकर विशेष आयोजन किए जा रहे हैं।
शुक्रवार सुबह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ श्रीकृष्ण जन्मस्थान पहुंचे। मुख्यमंत्री ने सुबह करीब 9:55 बजे जन्मस्थान पहुंचकर गर्भगृह में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप के दर्शन किए। जन्माष्टमी के अवसर पर गर्भगृह को विशेष रूप से सजाया गया है। गर्भगृह की दीवारों पर चांदी की परत चढ़ाई गई है, जिससे परिसर भव्य और आकर्षक नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री ने दर्शन के साथ ही जन्मोत्सव की तैयारियों का भी जायजा लिया।
बताया गया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सीएम योगी का श्रीकृष्ण जन्मस्थान का 20वां दौरा है। जन्माष्टमी के अवसर पर जन्मस्थान परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर प्रशासन की ओर से भी विशेष इंतजाम किए गए हैं।
मध्यरात्रि में होगा कान्हा का जन्मोत्सव
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी की मुख्य पूजा रात में की जाती है। श्रद्धालु मध्यरात्रि में लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर उनका विशेष श्रृंगार करते हैं और माखन-मिश्री, फल, धनिया पंजीरी सहित विभिन्न सात्विक व्यंजनों का भोग लगाते हैं।
जन्मोत्सव के समय मंदिरों और घरों में ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारे गूंजते हैं। इसके बाद आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है।
मंदिरों में विशेष सजावट और आयोजन
जन्माष्टमी पर देशभर के कृष्ण मंदिरों में विशेष झांकियां, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। ग्वालियर के ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण का राजसी श्रृंगार किया जा रहा है। वहीं उज्जैन के समीप नारायणा धाम मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनके बाल सखा सुदामा की पूजा की परंपरा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
श्रीकृष्ण की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ उनके जीवन और भगवद्गीता के संदेशों को याद करने का अवसर भी माना जाता है। श्रीकृष्ण की शिक्षाओं में कर्म पर ध्यान देने, मन को नियंत्रित रखने, क्रोध और लालच से दूर रहने तथा दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने पर जोर दिया गया है। यही कारण है कि जन्माष्टमी का पर्व धार्मिक आस्था के साथ जीवन मूल्यों और कर्तव्यबोध से भी जुड़ा माना जाता है।
पूजा के समय का रखें ध्यान
जन्माष्टमी पर पूजा का समय अलग-अलग स्थानों के पंचांग और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और व्रत पारण का समय निर्धारित करना चाहिए। जन्माष्टमी की मुख्य पूजा मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय करने की परंपरा है।








