Saharanpur News कम्बोह माजरा श्रीराम कथा में गूंजा राष्ट्र और धर्म रक्षा का संदेश, कथा व्यास संजय प्रपन्नाचार्य ने बताए रामराज्य के आदर्श

सहारनपुर के बेहट क्षेत्र स्थित कम्बोह माजरा के सिद्धपीठ श्री हनुमान मंदिर में आयोजित श्रीराम कथा में कथा व्यास पंडित संजय प्रपन्नाचार्य महाराज ने राष्ट्र और धर्म रक्षा का संदेश देते हुए रामराज्य के आदर्शों पर प्रकाश डाला।

 

शहरी चौपाल ब्यूरो 

बेहट। तहसील बेहट क्षेत्र के गांव कम्बोह माजरा स्थित सिद्धपीठ श्री हनुमान मंदिर में आयोजित श्रीराम कथा में शुक्रवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा व्यास पंडित संजय प्रपन्नाचार्य महाराज ने भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए राष्ट्र और धर्म रक्षा के लिए समर्पण का संदेश दिया।

कथा के दौरान पंडित संजय प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का पूरा जीवन राष्ट्र, धर्म और समाज की रक्षा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी समाज को श्रीराम के आदर्शों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

उन्होंने कथा में बताया कि महाराज दशरथ ने भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन उस समय रावण के अत्याचारों से समाज भय और पीड़ा में जी रहा था। लोगों का मनोबल टूट चुका था और अत्याचार सहना उनकी मजबूरी बन गया था। ऐसी परिस्थिति में भगवान श्रीराम ने माता कैकेयी के साथ मिलकर राष्ट्र और धर्म रक्षा की गोपनीय योजना बनाई।

कथा व्यास ने कहा कि माता कैकेयी ने राष्ट्रहित में अपना पति, पुत्र और सम्मान तक त्याग दिया तथा जीवनभर बदनामी का दंश सहने के लिए स्वयं को तैयार किया। इसी योजना के अंतर्गत भगवान श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया और वनवासी समाज, भील, निषाद, केवट, वानर और भालुओं को साथ लेकर अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने अपने मधुर व्यवहार और आदर्श जीवन के माध्यम से समाज के हर वर्ग को जोड़ने का कार्य किया। यही कारण है कि आज भी रामराज्य को आदर्श शासन व्यवस्था माना जाता है।

पंडित संजय प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि रामराज्य की स्थापना केवल भगवान श्रीराम के प्रयासों से नहीं हुई, बल्कि राजा दशरथ, माता कौशल्या, सुमित्रा, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, माता सीता, उर्मिला, माण्डवी और श्रुतिकीर्ति सहित पूरे परिवार के त्याग, सेवा और समर्पण का उसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने पुत्र धर्म निभाते हुए राजसुख छोड़कर वनवास को सहर्ष स्वीकार किया और समाज को यह संदेश दिया कि राष्ट्र और धर्म सर्वोपरि हैं।

कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति भाव में डूबे नजर आए। मंदिर परिसर में धार्मिक माहौल बना रहा और जय श्रीराम के जयघोष गूंजते रहे।

इस अवसर पर महंत संतोषदास, बाबा गणेशदास, स्वामी चिंतनदास, अशोक शर्मा, बाबू प्रेमचंद, बूटाराम, ऋषीपाल काम्बोज, नरेश कुमार, राकेश, बाबूराम, राजबीर सिंह, बाला देवी, आस्था, मधु, बिरमवती, शिमला, रश्मि सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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