शहरी चौपाल न्यूज
जम्मू। कश्मीर में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद की तैयारियों के बीच इस बार एक नई तस्वीर देखने को मिल रही है। घाटी के पशु बाजारों में पहली बार बड़ी संख्या में ऊंट दिखाई दे रहे हैं। ऊंट व्यापारी कश्मीर पहुंच चुके हैं और लोगों को ऊंट की कुर्बानी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इससे पारंपरिक पशु बाजारों में नई हलचल पैदा हो गई है और लोगों में इस नई परंपरा को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है।
अब तक कश्मीर में बकरीद के दौरान मुख्य रूप से भेड़, बकरियों और मवेशियों की कुर्बानी दी जाती रही है, लेकिन बदलते समय के साथ ऊंट की कुर्बानी को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ने लगी है। व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच इस्लामी परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है और इसी कारण ऊंट की कुर्बानी को लेकर भी रुचि देखने को मिल रही है।
व्यापारियों के अनुसार इस्लाम में ऊंट की कुर्बानी पूरी तरह मान्य मानी जाती है। खास बात यह है कि एक ऊंट की कुर्बानी में सात लोग तक साझेदारी कर सकते हैं। यही वजह है कि कई परिवार और दोस्तों के समूह इसे आर्थिक रूप से अधिक किफायती विकल्प मान रहे हैं। अलग-अलग जानवर खरीदने की तुलना में एक ऊंट में साझेदारी करना कई लोगों को सुविधाजनक लग रहा है।
कश्मीर पहुंचे एक ऊंट व्यापारी ने बताया कि घाटी में लोगों का रुझान धीरे-धीरे बदल रहा है। पहले जहां लोग केवल बकरियों और भेड़ों तक सीमित रहते थे, वहीं अब लोग ऊंट के बारे में जानकारी ले रहे हैं और इसकी धार्मिक मान्यता को समझने की कोशिश कर रहे हैं। कई खरीदार ऊंटों को देखने के लिए बाजारों में पहुंच रहे हैं और उनके दाम, वजन और कुर्बानी की प्रक्रिया के बारे में सवाल पूछ रहे हैं।
घाटी के कई पशु बाजारों में ऊंट आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। जहां भी ऊंटों से भरे वाहन पहुंच रहे हैं, वहां लोगों की भीड़ जमा हो रही है। बच्चे और युवा खास तौर पर ऊंटों को देखने के लिए उत्साहित नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी कश्मीर के बाजारों में इतने ऊंट नहीं देखे थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव मुस्लिम समाज में दूसरे क्षेत्रों की परंपराओं के प्रति बढ़ती जागरूकता और सोशल मीडिया के प्रभाव का भी परिणाम है। देश और दुनिया के कई हिस्सों में ऊंट की कुर्बानी लंबे समय से प्रचलित है, लेकिन कश्मीर में यह परंपरा अपेक्षाकृत नई मानी जा रही है।
हालांकि कुछ लोग इसे नई और दिलचस्प पहल मान रहे हैं, वहीं कई पारंपरिक परिवार अब भी भेड़ और बकरियों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके बावजूद ऊंट व्यापारियों की बढ़ती मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि आने वाले वर्षों में कश्मीर की बकरीद परंपराओं में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
बाजारों में बढ़ती भीड़ और ऊंटों के प्रति लोगों की उत्सुकता ने इस बार की बकरीद को खास बना दिया है। व्यापारियों को उम्मीद है कि जैसे-जैसे लोगों में जानकारी बढ़ेगी, वैसे-वैसे ऊंट की कुर्बानी का चलन भी घाटी में तेजी से बढ़ेगा। बढ़ेगा।








