मनोज मिड्ढा
सहारनपुर। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका उद्देश्य केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के बीच एक जिम्मेदार संवाद स्थापित करना भी है। पत्रकार की कलम जनता की आवाज होती है और उसकी खबर शासन-प्रशासन को जवाबदेह बनाती है। लेकिन बदलते डिजिटल दौर में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक ने जहां हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है, वहीं पत्रकारिता के नाम पर बढ़ती भीड़ ने इस पेशे की विश्वसनीयता और गरिमा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सहारनपुर सहित प्रदेश के कई जिलों में आज स्थिति यह है कि किसी भी सरकारी कार्यक्रम, प्रेस वार्ता, उद्घाटन समारोह या सार्वजनिक आयोजन में वास्तविक पत्रकारों से अधिक तथाकथित पत्रकार दिखाई देने लगे हैं। यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज या व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर अनेक लोग स्वयं को पत्रकार घोषित कर रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन केवल मोबाइल कैमरा या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म होने भर से पत्रकारिता का दायित्व स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता।
पत्रकारिता एक पेशा ही नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। इसके लिए तथ्यों की समझ, भाषा पर पकड़, निष्पक्षता, नैतिकता और कानून की जानकारी आवश्यक होती है। समाचार प्रकाशित करने से पहले उसकी पुष्टि करना, दोनों पक्षों को सुनना और जनहित को प्राथमिकता देना पत्रकारिता की मूल पहचान है। इसके विपरीत केवल वायरल वीडियो या सनसनीखेज सामग्री तैयार करना पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता।
आज पुलिस और प्रशासन की प्रेस वार्ताओं में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग पहुंच जाते हैं जिनका किसी स्थापित समाचार संस्थान से कोई नियमित संबंध नहीं होता। कई बार प्रेस वार्ता की मेज पर दर्जनों आईडी माइक रखे दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें से अनेक केवल औपचारिक पहचान तक सीमित रह जाते हैं। इससे वास्तविक पत्रकारों के कार्य में भी बाधा उत्पन्न होती है और प्रेस वार्ता का उद्देश्य प्रभावित होता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब पत्रकारिता की पहचान का उपयोग निजी प्रभाव या अनुचित लाभ के लिए किया जाने लगता है। समाज में समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि कुछ लोग छोटे-मोटे निर्माण कार्यों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों या स्थानीय विवादों में मीडिया का नाम लेकर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों से पूरे पत्रकार समुदाय की छवि प्रभावित होती है और वर्षों से ईमानदारी से काम कर रहे पत्रकारों की साख पर भी असर पड़ता है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि आज भी बड़ी संख्या में समर्पित पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचते हैं, तथ्यों की पुष्टि करते हैं, जनहित के मुद्दों को उठाते हैं और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। यही पत्रकार लोकतंत्र की वास्तविक ताकत हैं, लेकिन बढ़ती भीड़ में उनकी पहचान धुंधली होती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया का विरोध नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके लिए भी स्पष्ट आचार संहिता और जवाबदेही तय होनी चाहिए। कंटेंट क्रिएटर, ब्लॉगर, यूट्यूबर और पत्रकार—इन सभी की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पहचान स्पष्ट रखनी चाहिए ताकि समाज भी भ्रमित न हो।
पत्रकार संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे नए लोगों को पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों, भाषा, कानून और मीडिया नैतिकता का प्रशिक्षण दें। साथ ही प्रशासन और सरकारी विभागों को भी प्रेस वार्ताओं में वास्तविक और सक्रिय मीडिया प्रतिनिधियों की पहचान सुनिश्चित करने की दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से प्रश्न पूछना, समाज की समस्याओं को सामने लाना और लोकतंत्र को मजबूत करना है। यदि यह पेशा केवल पहचान, प्रभाव या व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बन जाएगा तो इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होगा।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा को बचाने की है। समाज, प्रशासन, मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिससे वास्तविक पत्रकारिता को सम्मान मिले और जिम्मेदार पत्रकारों की पहचान सुरक्षित रह सके।
पत्रकारिता केवल कैमरा, माइक या सोशल मीडिया अकाउंट का नाम नहीं है। पत्रकारिता सच, जिम्मेदारी, निष्पक्षता और जनसेवा का दूसरा नाम है। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं की गई तो लोकतंत्र का यह मजबूत स्तंभ धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।








