शहरी चौपाल ब्यूरो
सहारनपुर। सहारनपुर मंडल में इन दिनों क्लोनल यूकेलिप्टस (ईसीईडी के-7) पौधों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों के लिए आय का एक नया और लाभकारी विकल्प उभरकर सामने आया है। मुजफ्फराबाद ब्लॉक, घाट क्षेत्र और कालूवाला पहाड़ीपुर इलाके में इस प्रजाति की खेती को लेकर किसानों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। उच्च गुणवत्ता की लकड़ी उत्पादन क्षमता और कम समय में तैयार होने की विशेषता के चलते यह पौधा पारंपरिक खेती के मुकाबले ज्यादा मुनाफा देने वाला साबित हो रहा है।
उपवन सामाजिक वानिकी ट्रस्ट के अध्यक्ष अनीसुर रहमान ने बताया कि ईसीईडी (के-7) क्लोनल यूकेलिप्टस आधुनिक तकनीक से तैयार किया जाता है, जिससे पौधों में समान वृद्धि और बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। उन्होंने कहा कि सहारनपुर क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी इस प्रजाति के लिए बेहद अनुकूल है, यही कारण है कि किसान तेजी से इस ओर आकर्षित हो रहे हैं।
उन्होंने बताया कि इस क्लोन की सबसे बड़ी खासियत इसकी तेज वृद्धि दर है, जिसके चलते यह पौधा मात्र चार से पांच वर्षों में कटाई के लिए तैयार हो जाता है। इसका सीधा और लंबा तना, अधिक जैविक उत्पादन और कम रखरखाव लागत इसे अन्य फसलों की तुलना में अधिक लाभकारी बनाती है। कागज उद्योग, प्लाईवुड और बिजली के खंभों में इसकी लकड़ी की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छा बाजार भी मिल रहा है।
इस दिशा में Star Paper Mill Limited भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कंपनी के प्रबंध निदेशक मधुकर मिश्रा के नेतृत्व और उपाध्यक्ष आई.जे. सिंह के निर्देशन में उन्नत नर्सरी तकनीकों के जरिए उच्च गुणवत्ता वाले पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है।
किसानों को जागरूक करने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम और गोष्ठियों का आयोजन भी किया जा रहा है। हाल ही में कालूवाला पहाड़ीपुर क्षेत्र में आयोजित एक किसान गोष्ठी में कई प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया और अपने खेतों में ईसीईडी (के-7) यूकेलिप्टस लगाने की इच्छा जताई। किसानों का मानना है कि यह फसल भविष्य में स्थायी आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस पौधे की रोपाई तीन गुणा दो या चार गुणा दो मीटर दूरी पर करनी चाहिए। दोमट या हल्की रेतीली मिट्टी इसके लिए उपयुक्त रहती है और शुरुआती एक से दो वर्षों तक नियमित सिंचाई आवश्यक होती है। संतुलित उर्वरकों के प्रयोग से उत्पादन में और अधिक वृद्धि की जा सकती है। चार से पांच वर्षों में यह फसल तैयार होकर किसानों को अच्छा लाभ देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को उचित तकनीकी मार्गदर्शन, गुणवत्तापूर्ण पौधे और बेहतर बाजार उपलब्ध होता रहा, तो क्लोनल यूकेलिप्टस सहारनपुर मंडल में कृषि आधारित आय को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाएगा और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा।








